शिक्षक भर्ती में क्या है प्रशिक्षण जिला वरीयता? पढ़ें

■ आज हम प्रशिक्षण जिला वरीयता पर फिर से थोड़ा प्रकाश डालने जा रहे हैं।
■ प्रशिक्षण जिला वरीयता से 15000 भर्ती में ही परेशानियां शुरू हुईं। उसको लखनऊ बेंच में और इलाहबाद में चैलेंज भी किया गया।
उसके बाद 16448 भर्ती में एक एक्सपेरिमेंट किया गया और 3 जिला में शून्य पद देकर उनको किसी भी जिले में प्रथम काउंसलिंग कराने की छूट दी और अब 12,460 भर्ती में(12,401) 24 जिलो को यह छूट दे दी गयी है।

■ प्रशिक्षण जिला वरीयता अटल नही है ये जायेगी हाइकोर्ट से भी और सुप्रीम कोर्ट से भी। कैसे? उसके लिए आप यह पूरा आर्टिकल पढ़ेंगे तो समझ आजायेगा।

■ उत्तराखण्ड में प्राइमरी स्कूल टीचर के पद पर नियुक्ति के लिए 15.12.2011 को एक विज्ञापन निकला था जिसमे यह शर्त साफ साफ रखी गयी थी--
that only such candidates will be eligible for the posts in a District who have permanent residence in that particular District, in other-words their home District.

■ याची ने कोर्ट में याचिका दाखिल की कि यह शर्त भारत के संविधान के आर्टिकल 16(2) और 16(3) का उल्लंघन है।

■ क्या कहता है आर्टिकल 16(2)?
As per clause (2) no citizen shall, no grounds only of religion, race, caste, sex, descent, *place of birth, residence or any of them, be ineligible for, or discriminated against in respect of, any employment or office under the State.* Therefore, there can be no discrimination against a citizen on ground of his place of birth or residence.

■ क्या कहता है आर्टिकल 16(3)?
Nothing in this article shall prevent Parliament from making any law prescribing, in regard to a class or classes of employment or appointment to an office under the Government of, or any local or other authority within, a State or Union territory, any requirement as to residence within that State or Union territory prior to such employment or appointment.
मतलब 16(3) में बस संसद को यह अधिकार है राज्य सरकार को नहीं और संसद को भी एक सीमा में यह अधिकार है लेकिन इस भर्ती में राज्य सरकार ने वो किया जिसका अधिकार उसको नही था।
Even Parliament does not have power under the Constitution of India to prescribe a residence of a village, Tahseel of a District in the given situation.

■ संसद और राज्य सरकार के अधिकार को लेकर यह आदेश नरसिम्हा राव बनाम आंध्रप्रदेश सरकार में भी पारित हो चुका है।

■ उड़ीसा ट्रिब्यूनल और सुप्रीम कोर्ट ने भी सुधीर कुमार बिस्वाल के केस में इस तरह की जिला बाध्यता को रद्द किया है।
the rule framed by the State Government asking applications for public employment from on the residence of that district is in violation of Article 16(2) of the Constitution of India.

■ अब जब यह साबित होगया की राज्य सरकार को यह अधिकार नही है तो राज्य सरकार के साथ साथ प्रशिक्षण जिला वरीयता समर्थकों ने कोर्ट में यह तर्क रखा कि
residence is a valid criteria here as a person residing in a particular area would be well versed in the area and would be in a position to communicate in the dialect spoken in that area.
मतलब उन्होंने अब बात भाषा और क्षेत्र की भौगौलिक जानकारी पर घुमानी चाही।

■ अब जिला वरीयता समर्थकों के इस तर्क की बात करे तो राजस्थान सरकार के विरुद्ध कैलाश शर्मा की याचिका में यह तर्क भी ख़ारिज है।
कोर्ट ने कहा
It is not possible to compartmentalize the State into Districts with a view to offer employment to the residents of that District on a preferential basis.
मतलब भाषा और भौगौलिक स्थिति की जानकारी होने पर प्राथमिकता देने की बात भी कोर्ट ने खारिज करदी।

■ जब ये दोनों तर्क कोर्ट ने नकार दिए तो सरकार निकालकर लाई संविधान का आर्टिकल 350(a)।

Facilities or instruction in mother-tongue at primary stage.- It shall be the endeavour of every State and of every local authority within the State to provide adequate facilities for instruction in the mother-tongue at the primary stage of education *to children belonging to linguisticminority groups*; and the President may issue such directions to any State as he considers necessary or proper for securing the provision of such facilities.

मतलब राज्य सरकार का यह दायित्व होना चाहिए की वो भाषाई अल्पसंख्यक समूह के बच्चों को प्राइमरी स्तर पर उनकी मातृभाषा में ही instruct करें।

■ अब यह अपने आप में ही हास्यास्पद है पहला तो ये कि यह आर्टिकल भाषाई अल्पसंख्यक समूह के बच्चों को समझाने के लिए है जबकि ऐसे अल्पसंख्यक समूह अब राज्य में नहीं है।
दूसरा ये की हमारी मातृभाषा हिंदी है, पाठ्य पुस्तकें भी हिंदी में है और शिक्षा का माध्यम भी हिंदी है। तो जब पूरे राज्य में एक ही क्राइटेरिया फ़ॉलो होता है एक ही पाठ्यक्रम पढ़ाया जाता है तो आर्टिकल 350(a) का कोई मतलब ही नही रह जाता है।

■ जिला वरीयता समर्थकों के ये सभी तर्क जब ख़ारिज हो गए तो जज साहब को जिला वरीयता को ख़ारिज करने में भी देर नही लगी और इस आदेश के बाद नई नियमावली बनाई गई जिससे जिला वरीयता का नामोनिशान हट गया और अब उत्तराखण्ड के 13 जिलो की सीटें एक साथ स्टेट मेरिट से भरी जाती हैं जिसमे अभ्यर्थियों राज्य की सभी सीटों पर एक साथ दावेदारी रखते हैं और उनसे इन 13 जिलो का प्रेफरेंस आर्डर माँगा जाता है इसे ये अव्यवस्था नहीं फैलती की एक तरफ 62 वाला चयनित और दूसरी तरफ 76 वाला अचयनित।
इसे इस तरह समझिये की सीतापुर की 809 सीट्स के बजाए आप 12,001 सीट्स पर दावेदारी ठोकेंगे जिससे चयनित होने की प्रोबेबिलिटी बढ़ जाती है और नौकरी किस्मत के खेल की बजाए वाकई लॉजिक से मिलती है अभी तो 24 जिलो वालो में जो सही जगह पहुंच गया उसकी नौकरी पककी और 51 जिले वाले बेचारे दूसरी काउंसलिंग का इंतजार करेंगे वहां भी भाग्य का खेल।

■ यदि टेट मेरिट भी लग जाती है तो भी जिला वरीयता दुःख देगी सभी जिला वरीयता के पीड़ितों से मेरा ये आह्वाहन है कि आइये इस लड़ाई में हमारा साथ दीजिये हम प्रयासरत हैं की जिला वरीयता हटवाकर स्टेट वाइज मेरिट का प्रावधान लागू करवाये वो भी retrospectively ताकि 15000 में अप्लाई करने वाले अचयनित 15000 में ही नौकरी पाएं जिनको 16448 में भी इस नियम के कारण नौकरी नहीं मिल पाई।
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