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स्थानांतरण/समायोजन में पेंच को लेकर शिक्षकों में भ्रम

सर्वोच्च न्यायालय का स्थगनादेश स्थानान्तरण/समायोजन में भी हो सकता है प्रभावी--सूत्र
प्रतापगढ़। शिक्षकों के समायोजन में पेंच ही पेंच दिख रहा है ऐसे में शासन द्वारा बनायीं गयी नीति सरकार के ही गले की हड्डी बन सकती है।


        गौर तलब तो यह है किअप्रैल माह की संख्या पर स्थानांतरण/समायोजन किया जाना है।प्राथमिक विद्यालयो में अप्रैल माह में वच्चों के प्रवेश पर गौर करे तो शून्य ही रहती है ।वैसे भी परीक्षा के बाद बच्चे स्वयं स्कूल आना बंद कर देते है इससे कक्षा एक में प्रवेश न के बराबर रहता है जुलाई माह से ही प्रवेश की शुरुआत होती है जो 30 सितम्बर तक चलती है।स्थानांतरण प्रायः 30 सितम्बर की छात्र संख्या पर हुआ करती थी।कक्षा 1 व 6 में छात्र संख्या का सही आकड़ा सरकार के लक्ष्य को हवा हवाई कर सकता है।अप्रैल माह की छात्र संख्या पर जहा शिक्षक सरप्लस दिख रहे है वही सितम्बर की छात्र संख्या में शिक्षक कमी से जूझेंगे परिषदीय स्कूल।
       एक ओर परिषदीय विद्यालयों में 98 फीसदी सरप्लस शिक्षकों में शिक्षामित्रों की संख्या है।इन सरप्लस शिक्षकों का मामला सर्वोच्च न्यायालय के अधीन है और वर्त्तमान में सुप्रीम कोर्ट का तब तक शिक्षामित्रों के प्रकरण पर यथास्थिति का आदेश प्रभावी रहेगा जब तक निश्चित रूप में सर्वोच्च न्यायालय का कोई अंतरिम आदेश पारित नहीं होता।
        प्रदेश शासन की नीति में 55 वर्ष की आयु पूरा कर चुके शिक्षकों के लिए कोई नियम निर्देश न जारी करना यह भी एक पेंच भरा सवाल है।शासन की ही माने तो 55 वर्ष की आयु पूरा कर चुके शिक्षकों का स्थानांतरण नहीं किया जा सकता है।इधर एकेडमिक भर्ती वाले  भी न्यायालय की जद में है और फैसला करीब है।29334 विज्ञान, गणित,भाषा शिक्षक,सामाजिक बिषय,उर्दू बिषय के तहत नियुक्ति पाये शिक्षकों को भी नियमानुसार हटाया नहीं जा सकता क्योकि इनकी पदस्थापना एक बिशेष भर्ती के तहत हुई है।
   मामला जो भी हो शासन की ये त्रुटियाँ शिक्षकों को सुनहरा अवसर देती प्रतीत हो रही है।शासन की इस भूल पर उच्चन्यायालय की नजर टेढ़ हुई तो स्थानांतरण/समायोजन की कवायद धरी की धरी रह जायेगी।
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