पेंशन को 'आर्थिक लाभ' नहीं माना जा सकता : हाई कोर्ट

 पेंशन को 'आर्थिक लाभ' नहीं माना जा सकता : हाई कोर्ट

, प्रयागराजः इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि पेंशन को 'आर्थिक लाभ' नहीं माना जा सकता है। इसलिए मुआवजे की गणना में उसे घटाया नहीं जा सकता। यह टिप्पणी करते हुए न्यायमूर्ति संदीप जैन की एकलपीठ ने मुग्गा देवी व चार अन्य की अपील स्वीकार कर ली है। कोर्ट ने मुआवजे के लिए मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण, (एमएसीटी) मुरादाबाद की गणना का आदेश संशोधित करते हुए 15,22,545 रुपये मुआवजे का भुगतान सात प्रतिशत सालाना ब्याज के साथ करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि इसकी भरपाई वास्तविक


भुगतान तक याचिका दाखिल करने की तिथि से होगी और भुगतान बीमा कंपनी को करना होगा। पहले हो चुका भुगतान समायोजित किया जा सकेगा।


मुकदमे से जुड़े तथ्यों के अनुसार वाहन संख्या यूपी-21-बीके-5747 से हुए हादसे में सात फरवरी 2018 को पेंशन भोगी जयप्रकाश सिंह की मृत्यु हो गई थी। उनकी आयु लगभग 73 साल थी। उन्हें प्रति माह 23,936 रुपये की मासिक पेंशन मिल रही थी। ट्रिब्यूनल ने इस आधार पर कि मृतक की पत्नी को प्रति माह 14,900 रुपये की पारिवारिक पेंशन मिल रही थी, अंतर राशि 9,036 रुपये प्रति माह


पर मुआवजे का आकलन किया था। हाई कोर्ट में ट्रिब्यूनल के 12 जुलाई 2024 के आदेश को चुनौती दी गई थी। याची के अधिवक्ता का कहना था कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार फैमिली पेंशन को मृतक की आय से घटाना नहीं चाहिए। मुआवजे की गणना मृतक की पूरी पेंशन पर की जानी चाहिए। प्रतिवादी-बीमा कंपनी की तरफ से कहा गया कि दुर्घटना के समय मृतक की आयु लगभग 73 वर्ष थी और उनका कोई भविष्य नहीं था। न्यायाधिकरण ने मुआवजे का आकलन करते समय मृतक की पेंशन से सही ढंग से घटाया है। इसलिए अपील पोषणीय नहीं है


और इसे खारिज किया जाए। कोर्ट ने कहा, यह कानून सर्वविदित है कि मुआवजे की राशि से बीमा, पेंशन लाभ, ग्रेच्युटी या मृतक के किसी रिश्तेदार को रोजगार दिए जाने के कारण कोई कटौती नहीं की जा सकती। दोनों पक्षों को सुनने के बाद फैसले में अपील स्वीकार कर ली। बढ़ी हुई मुआवजे की राशि न्यायाधिकरण के समक्ष दो महीने के भीतर जमा करने का निर्देश कोर्ट ने दिया है। कहा है कि न्यायाधिकरण दावेदारों की आयु और आश्रितता को ध्यान में रखते हुए बढ़ी हुई मुआवजे की राशि आनुपातिक रूप से प्रदान करने के लिए स्वतंत्र होगा।