Adhoc से Regular हुए Assistant Professors की Seniority पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला | Latest High Court News

इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक आदेश: तदर्थ सेवा भी गिनी जाएगी सीनियरिटी में?

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के सरकारी डिग्री कॉलेजों में कार्यरत तदर्थ (Adhoc) से नियमित हुए असिस्टेंट प्रोफेसरों के लिए एक बेहद अहम और दूरगामी असर वाला फैसला सुनाया है।

यह आदेश उन हजारों शिक्षकों के लिए राहत लेकर आया है, जिनकी तदर्थ सेवा को अब तक सीनियरिटी में नहीं जोड़ा जा रहा था।


🔹 क्या है पूरा मामला?

डॉ. वीरपाल सिंह द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी ने पाया कि राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट दिशा-निर्देशों के बावजूद सही ढंग से विचार नहीं किया

सरकार ने:

  • तदर्थ सेवा को वेतन वृद्धि

  • पेंशन

  • अन्य सेवा लाभों

में तो गिना, लेकिन
👉 सीनियरिटी और प्रोन्नति (Promotion) में जोड़ने से इनकार कर दिया।


🔹 हाईकोर्ट ने क्या कहा?

हाईकोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि:

“यदि तदर्थ सेवा को वेतन और पेंशन के लिए माना गया है, तो उसे वरिष्ठता से बाहर रखना अनुचित और मनमाना है।”

कोर्ट ने:
✔️ तदर्थ सेवा को सीनियरिटी में न गिनने वाले आदेश को रद्द कर दिया
✔️ सचिव, उच्च शिक्षा को सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के आलोक में पुनर्विचार का निर्देश दिया
✔️ चेतावनी दी कि दोबारा कोर्ट आने पर संबंधित अधिकारी पर सख्त कार्रवाई होगी


🔹 याची के पक्ष में मजबूत तथ्य

  • तदर्थ नियुक्ति के बाद चार बार नियमितीकरण की संस्तुति

  • अंततः 3 फरवरी 2005 को नियुक्ति तिथि से नियमितीकरण

  • सेवा में निरंतरता (Continuity) बनी रही

इन तथ्यों के आधार पर कोर्ट ने माना कि याची प्रारंभिक नियुक्ति तिथि से सभी लाभों के हकदार हैं।


🔹 सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का असर

सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि:

  • यदि तदर्थ नियुक्ति नियमों के अनुसार हुई हो

  • चयन प्रक्रिया में कोई अनियमितता न हो

  • सेवा निरंतर चली हो

तो तदर्थ सेवा को सीनियरिटी में जोड़ा जाएगा


🔹 इस फैसले से किसे फायदा होगा?

✅ सरकारी डिग्री कॉलेजों के असिस्टेंट प्रोफेसर
✅ तदर्थ से नियमित हुए शिक्षक
✅ जो प्रमोशन या चयन वेतनमान से वंचित हैं

यह फैसला पूरे उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि अन्य राज्यों के लिए भी मिसाल बनेगा।


🔹 निष्कर्ष

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह आदेश शिक्षकों के अधिकारों की रक्षा की दिशा में मील का पत्थर है। अब मनमाने ढंग से तदर्थ सेवा को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।