इलाहाबाद : उप्र लोकसेवा आयोग की सीबीआइ जांच में सिर्फ पूर्व अध्यक्ष अनिल यादव व उनके करीबी ही नहीं आएंगे, बल्कि मौजूदा अध्यक्ष व कार्य कर रही चयन समिति से भी सवाल पूछे जाएंगे।
इसकी वजह यह है कि तमाम भर्तियों के परिणाम इसी समिति ने घोषित किए हैं। पिछले महीनों में 24 भर्तियों के साक्षात्कार से आए रिजल्ट भी उनमें शामिल हैं। वैसे भी सिर्फ इंटरव्यू से चयन को लेकर पहले से सवाल उठते रहे हैं। हालांकि भाजपा सरकार ने अब सीधी भर्ती में इंटरव्यू की जगह लिखित परीक्षा कराने का निर्देश दिया है।
आयोग की भर्तियों को लेकर पिछले पांच वर्षो में जितने विवाद सामने आए हैं, शायद आयोग के पूरे कार्यकाल में उतने प्रकरण नहीं उठे होंगे। इसीलिए लगातार भर्तियों की सीबीआइ से जांच कराने की मांग मुखर होती रही। सपा सरकार ने इसे नहीं माना तो प्रतियोगी हाईकोर्ट तक पहुंचे। भाजपा सरकार ने सत्ता में आने से पहले इस जांच का वादा किया था और छह माह के अंदर उसका एलान भी कर दिया। अब सीबीआइ ने भी जांच करने की तैयारी कर ली है। इसमें मुख्य आरोपी के रूप में पूर्व अध्यक्ष अनिल यादव व उनके करीबियों का नाम ही बार-बार मुखर होता रहा है लेकिन, आयोग के मौजूदा अध्यक्ष डा. अनिरुद्ध यादव व कार्य कर रही चयन समिति की ओर किसी की निगाह नहीं गई।
असल में सूबे की सत्ता में आने के चंद दिन बाद ही भाजपा सरकार ने आयोग में चल रहे साक्षात्कार और परीक्षा परिणाम जारी करने पर रोक लगाई थी। उस समय करीब 24 भर्तियां चल रही थीं या फिर उनके साक्षात्कार होने थे। सरकार ने जुलाई में सीबीआइ की जांच कराने पर कैबिनेट से मुहर लगाने के साथ ही भर्तियों से रोक भी हटा ली थी। उसी के बाद ताबड़तोड़ साक्षात्कार से हुए चयन के परिणाम घोषित हुए। यह सिलसिला अब तक बरकरार है। इन भर्तियों का चयन मौजूदा अध्यक्ष व कार्यरत चयन समिति ने ही किया है और सारी भर्तियां सपा शासनकाल की हैं। ऐसे में मौजूदा अध्यक्ष व उनकी टीम भी जांच से बच नहीं सकेंगे। यही नहीं आयोग की कई अहम परीक्षाओं का पेपर आउट होने व अन्य तमाम विवाद भी मौजूदा टीम के रहते ही हुए हैं। उनका विवादों का उत्तर भी उन्हें देना होगा।

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इसकी वजह यह है कि तमाम भर्तियों के परिणाम इसी समिति ने घोषित किए हैं। पिछले महीनों में 24 भर्तियों के साक्षात्कार से आए रिजल्ट भी उनमें शामिल हैं। वैसे भी सिर्फ इंटरव्यू से चयन को लेकर पहले से सवाल उठते रहे हैं। हालांकि भाजपा सरकार ने अब सीधी भर्ती में इंटरव्यू की जगह लिखित परीक्षा कराने का निर्देश दिया है।
आयोग की भर्तियों को लेकर पिछले पांच वर्षो में जितने विवाद सामने आए हैं, शायद आयोग के पूरे कार्यकाल में उतने प्रकरण नहीं उठे होंगे। इसीलिए लगातार भर्तियों की सीबीआइ से जांच कराने की मांग मुखर होती रही। सपा सरकार ने इसे नहीं माना तो प्रतियोगी हाईकोर्ट तक पहुंचे। भाजपा सरकार ने सत्ता में आने से पहले इस जांच का वादा किया था और छह माह के अंदर उसका एलान भी कर दिया। अब सीबीआइ ने भी जांच करने की तैयारी कर ली है। इसमें मुख्य आरोपी के रूप में पूर्व अध्यक्ष अनिल यादव व उनके करीबियों का नाम ही बार-बार मुखर होता रहा है लेकिन, आयोग के मौजूदा अध्यक्ष डा. अनिरुद्ध यादव व कार्य कर रही चयन समिति की ओर किसी की निगाह नहीं गई।
असल में सूबे की सत्ता में आने के चंद दिन बाद ही भाजपा सरकार ने आयोग में चल रहे साक्षात्कार और परीक्षा परिणाम जारी करने पर रोक लगाई थी। उस समय करीब 24 भर्तियां चल रही थीं या फिर उनके साक्षात्कार होने थे। सरकार ने जुलाई में सीबीआइ की जांच कराने पर कैबिनेट से मुहर लगाने के साथ ही भर्तियों से रोक भी हटा ली थी। उसी के बाद ताबड़तोड़ साक्षात्कार से हुए चयन के परिणाम घोषित हुए। यह सिलसिला अब तक बरकरार है। इन भर्तियों का चयन मौजूदा अध्यक्ष व कार्यरत चयन समिति ने ही किया है और सारी भर्तियां सपा शासनकाल की हैं। ऐसे में मौजूदा अध्यक्ष व उनकी टीम भी जांच से बच नहीं सकेंगे। यही नहीं आयोग की कई अहम परीक्षाओं का पेपर आउट होने व अन्य तमाम विवाद भी मौजूदा टीम के रहते ही हुए हैं। उनका विवादों का उत्तर भी उन्हें देना होगा।

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