इलाहाबाद : उप्र लोकसेवा आयोग की पांच साल की भर्तियों की सीबीआइ जांच को लेकर आयोग और सरकार आमने-सामने आ गए हैं। पिछले नौ माह से आयोग में प्रदेश सरकार से टकराव को लेकर कशमकश चल रही थी, उस पर हाईकोर्ट में हुई याचिका से विराम लग गया है। इसे भ्रष्टाचार पर प्रहार के लिए राज्य सरकार की ओर से उठाए जा रहे कदमों पर रुकावट ही माना जा रहा है। आयोग ने सरकार का सीधे विरोध न कर विधिक रूप से हाईकोर्ट के माध्यम से तीर चलाया है।1गौरतलब है कि प्रदेश सरकार ने यूपी पीएससी में सपा शासन के दौरान एक अप्रैल 2012 से 31 मार्च, 2017 के बीच हुई सभी भर्तियों की सीबीआइ जांच का एलान 19 जुलाई को किया था। दिसंबर में केंद्र सरकार से इसकी अधिसूचना भी जारी हो चुकी है। इसके ठीक बाद 21 दिसंबर, 2017 को आयोग के अध्यक्ष डॉ. अनिरुद्ध सिंह यादव और सदस्यों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर सीबीआइ जांच की अधिसूचना की वैधता को चुनौती दे दी, जिसमें कहा गया कि उप्र लोकसेवा आयोग एक संवैधानिक संस्था है जिसके क्रिया कलापों की जांच कराना विधि विरुद्ध है। असल में भाजपा सरकार के गठन के तीसरे दिन ही 22 मार्च 2017 को भर्तियों के साक्षात्कार और अन्य परिणाम जारी करने पर रोक लगा दी थी। उसी समय आयोग के तत्कालीन सचिव अटल राय ने शासन से गुहार लगाई थी कि आयोग संवैधानिक संस्था है इसलिए इसकी परीक्षा प्रक्रिया का रोका जाना उचित नहीं है। ज्ञात हो कि आयोग के इतिहास में पहली बार प्रदेश सरकार ने आयोग का कामकाज मौखिक आदेश पर रोका था। 1यह भी गौरतलब है कि आयोग के पूर्व अध्यक्ष डा. अनिल यादव की नियुक्ति को इलाहाबाद हाईकोर्ट पहले ही अवैध ठहरा चुका है। इसके बाद से आयोग की भर्तियों में गंभीर आरोप लगते रहे हैं। प्रतियोगी छात्र संघर्ष समिति ने कई बार जबर्दस्त आंदोलन किया था। जिसमें भर्तियों में धांधली, स्केलिंग में एक ही वर्ग विशेष को तवज्जो देना, साक्षात्कार में नियमों का घोर उल्लंघन कर मनमाने नंबर देने और अनुचित फैसले लेकर उन छात्रों को रेस से बाहर किया गया जो परीक्षा अच्छे नंबरों से उत्तीर्ण होने का माद्दा रखते थे।
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