68500 शिक्षक भर्ती में हुई अनियमितता अब जगजाहिर हो चुकी है। संविधान के चौथे स्तम्भ मीडिया ने इसकी प्याज की तरह परते खोल कर रख दी हैं। 68500 शिक्षक भर्ती से सम्बंधित ऐसा कोई अधिकारी/कर्मचारी नही जिस पर प्रशासनिक कार्यवाही न हुई हो।
अब सवाल ये है कि जब आयोजक ही गलती किये हैं तो परीक्षा की सुचिता कैसे मेंटेनेबल हो गयी?
सरकार भर्ती को रद्धता से बचाने के लिए हर सम्भव प्रयास करती नजर आ रही, यथा- अपने ही कर्मियों द्वारा जांच कमेटी गठन, कॉपियों का पुनर्मूल्यांकन, कापियों को जलाया जाना आदि आदि........
और तो और मजे की बात तो तब हुई जब सरकार सभी अभ्यर्थियों को ऑनलाइन मांगने के लिए विज्ञप्ति प्रकाशित कर सभी इच्छुक अभ्यर्थियों का पुनर्मूल्यांकन कराने जा रही है जो कि निर्गत शासनादेशों के विपरीत है।
शासनादेश में इस प्रकार की प्रक्रिया का कोई उल्लेख ही नहीं है की सभी अभ्यर्थियों से पुनर्मूल्यांकन के लिए कोई आवेदन पत्र आमंत्रित किये जायें। इसका सीधा सा मतलब है कि सरकार जांच के नाम पर कोर्ट को गुमराह करने में कोई कमी नही छोड़ रही है।
विगत सुनवाई में कोर्ट ने सरकार से जांच कमेटी की फाइनल रिपोर्ट के बारे मे एडवोकेट जनरल से पूछा था,जिस पर एडवोकेट जनरल ने 07 अक्टूबर को जांच पूरी हो जाने की बात कोर्ट में रिकॉर्ड करवाई , इसी वक्तव्य पर कोर्ट ने इस फ़र्ज़ीवाड़े केस की सुनवाई 08 अक्टूबर को नियत की थी।
सोनिका देवी सहित दर्जनों 68500 शिक्षक भर्ती में फर्जीवाड़े मुकदमो की सुनवाई 08 अक्टूबर को कोर्ट न0-23, मा0 जस्टिस इरशाद अली जी की एकल पीठ में, 38 फ्रेश केस के बाद एडिशनल में 02 न0 पर होनी सुनिश्चित है।
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