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मामूली आपराधिक मुकदमा होने पर नहीं रोक सकते पेंशन : हाईकोर्ट

 इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक आदेश में कहा है कि कर्मचारी के खिलाफ मामूली आपराध में मुकदमा लंबित होने और विभागीय जांच में उसे मामूली सजा होने के आधार पर उसके सेवानिवृत्ति परिलाभ रोके नहीं जा सकते हैं।

कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि कानून सक्षम प्राधिकारी को यह शक्ति देता है कि कर्मचारी के खिलाफ लंबित आपराधिक मुकदमे के समाप्त होने तक उसे सेवानिवृत्ति परिलाभ रोके जाएं, तो इस शक्ति का प्रयोग होना चाहिए लेकिन जहां अपराध बेहद सामान्य प्रकृति का है, वहां यह नियम लागू नहीं होगा। इसी के साथ कोर्ट ने मामूली आपराध में लंबित मुकदमे के आधार पर रिटायर पुलिसकर्मी के सेवानिवृत्ति परिलाभ रोकने के निर्णय को सही नहीं माना है।






यह आदेश मुख्य न्यायमू‌र्ति गोविंद माथुर एवं न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा की खंडपीठ ने आगरा के रिटायर कांस्टेबल उदयवीर सिंह के पक्ष में दिए गए एकल पीठ के आदेश को चुनौती देनी वाली राज्य सरकार की विशेष अपील पर दिया है। याची की ओर से अधिवक्ता ब्रह़म नारायण‌ सिंह ने बहस की। याची की अभिरक्षा से एक बंदी के भाग जाने का मुकदमा हरिपर्वत थाने में दर्ज है। इसका ट्रायल चल रहा है। विभागीय जांच में एसएसपी ने उसे निंदा टिप्पणी से दंडित किया है।


इस आधार पर सेवानिवृत्ति पर विभाग ने उसकी पेंशन, ग्रेच्युटी आदि का भुगतान रोक दिया। इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। एकल पीठ ने कहा कि याची के खिलाफ 2005 से मुकदमा लंबित है। काफी प्रयास के बावजूद मुकदमे का निस्तारण नहीं हो पाया है। विभागीय जांच में उसे निंदा टिप्पणी की सजा दी जा चुकी है। याची कैंसर जैसी गम्भीर बीमारी से जूझ रहा है इसलिए उसे पेंशन व अन्य भुगतान किए जाएं।


इस आदेश को राज्य सरकार ने विशेष अपील में चुनौती दी। सरकारी वकील का कहना था कि आपराधिक मुकदमा लंबित रहने के दौरान सेवानिवृत्ति परिलाभों का भुगतान नहीं किया जा सकता है। कोर्ट ने कहा है कि यदि ऐसा नियम है तो उसका पालन होना चाहिए लेकिन इस मामले में जहां याची को निंदा टिप्पणी जैसी मामूली सजा दी गई है, उस आधार पर भुगतान रोकना उचित नहीं है। खंडपीठ ने एकल पीठ के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

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