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प्रशिक्षु शिक्षकों के वेतन पर हाईकोर्ट सख्त, 26 फरवरी तक निर्णय नहीं तो सचिव को होना होगा पेश

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बेसिक शिक्षा परिषद के सचिव को प्रशिक्षु शिक्षकों के वेतन भुगतान के मामले में 26 फरवरी तक निर्णय लेने का स्पष्ट निर्देश दिया है। अदालत ने कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि आदेश का पालन नहीं किया गया, तो संबंधित सचिव को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होना पड़ेगा

अवमानना याचिका पर सुनवाई के दौरान आदेश

यह आदेश न्यायमूर्ति दिनेश पाठक की एकल पीठ ने सोनभद्र निवासी मोहम्मद अहमद व अन्य द्वारा दाखिल अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया। याचियों की ओर से अदालत को बताया गया कि वे प्रशिक्षु शिक्षक हैं और उन्हें वेतन भुगतान से वंचित रखा गया है।

2002 के शासनादेश का दिया गया हवाला

याचियों के अधिवक्ता ने दलील दी कि 24 अप्रैल 2002 के शासनादेश के अनुसार प्रशिक्षु शिक्षक प्रशिक्षित ग्रेड शिक्षक के रूप में वेतन पाने के पूर्ण हकदार हैं। इस संबंध में याचियों ने:

  • 3 अप्रैल 2024

  • 11 जुलाई 2024

को संबंधित अधिकारियों के समक्ष प्रत्यावेदन भी प्रस्तुत किए, लेकिन अब तक कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया।

हाईकोर्ट के पुराने आदेश की भी नहीं हुई अनुपालना

अधिवक्ता ने यह भी बताया कि इससे पहले हाईकोर्ट की एकल पीठ ने याचियों की रिट याचिका का निस्तारण करते हुए तीन महीने के भीतर प्रत्यावेदन पर निर्णय लेने का आदेश दिया था, लेकिन अधिकारियों ने उस आदेश का भी पालन नहीं किया।

डीबीएसए से जवाब तलब, जिम्मेदारी सचिव पर डाली गई

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पहले सोनभद्र के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी से जवाब तलब किया था। इस पर बीएसए ने अनुपालन हलफनामा दाखिल कर बताया कि यह मामला बेसिक शिक्षा परिषद के सचिव के अधिकार क्षेत्र में आता है।

इसके बाद कोर्ट ने सचिव को याचिका में शामिल करते हुए उन्हें आदेश के अनुपालन के लिए अंतिम अवसर दिया है।

कोर्ट का सख्त रुख, शिक्षकों में उम्मीद

हाईकोर्ट के इस सख्त रुख से प्रशिक्षु शिक्षकों में उम्मीद जगी है कि लंबे समय से लंबित वेतन भुगतान पर अब स्पष्ट और अंतिम निर्णय लिया जाएगा।

निष्कर्ष

प्रशिक्षु शिक्षकों के वेतन का मामला अब अदालत की सीधी निगरानी में है। यदि 26 फरवरी तक कोई निर्णय नहीं लिया गया, तो बेसिक शिक्षा परिषद के सचिव को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में उपस्थित होना पड़ेगा। यह आदेश प्रशासनिक लापरवाही पर न्यायपालिका की सख्ती को दर्शाता है।

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