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जब शिक्षक प्रशासक बन जाए, तो शिक्षा कैसे बचे?

गैर-शैक्षणिक कार्यों में उलझते शिक्षक और व्यवस्था की असल समस्या

भारत में शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि शिक्षकों को ज्ञान संवाहक या शिक्षा विशेषज्ञ के रूप में नहीं, बल्कि सामान्य सरकारी कर्मचारी की तरह देखा जाता है। इसी मानसिकता का परिणाम है कि देश भर में शिक्षकों का व्यापक उपयोग लगातार गैर-शैक्षणिक और प्रशासनिक कार्यों में किया जाता रहा है।

शिक्षक और गैर-शैक्षणिक कार्य: पुरानी बहस, नया संकट

शिक्षकों की भूमिका और जिम्मेदारियों को लेकर यह बहस कोई नई नहीं है। लेकिन हाल ही में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में शिक्षकों को बूथ स्तरीय अधिकारी (BLO) बनाए जाने के बाद यह मुद्दा फिर से राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में आ गया है।

देश के कई राज्यों से ऐसी खबरें सामने आई हैं, जिनमें कार्यभार और मानसिक दबाव के कारण बूथ स्तरीय अधिकारियों की मौत हुई है। हृदयाघात, अत्यधिक तनाव और यहां तक कि आत्महत्या जैसी घटनाएं यह बताती हैं कि समस्या व्यक्तिगत नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की संरचनात्मक विफलता है।

शिक्षा की गुणवत्ता पर सीधा असर

जब शिक्षकों को लगातार प्रशासनिक कामों में लगाया जाता है, तो इसका सीधा असर शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ता है। इसके साथ-साथ

  • शिक्षकों का सम्मान

  • मानसिक स्वास्थ्य

  • कार्य-जीवन संतुलन

तीनों गंभीर रूप से प्रभावित होते हैं।

अलग-अलग राज्यों से चिंताजनक घटनाएं

  • पश्चिम बंगाल में पुनरीक्षण कार्य के दौरान एक आंगनबाड़ी कार्यकर्ता की मौत

  • गुजरात में एक शिक्षक का पत्र, जिसमें उन्होंने अत्यधिक थकान और मानसिक दबाव के कारण कार्य जारी रखने में असमर्थता जताई

  • मध्य प्रदेश में प्रतिदिन 100 मतदाताओं के सर्वे का लक्ष्य पूरा न करने पर निलंबन और अगले ही दिन शिक्षक का निधन

ये सभी घटनाएं इस बात का संकेत हैं कि शिक्षकों पर डाला जा रहा प्रशासनिक बोझ मानवीय सीमाओं से परे जा चुका है।

क्या शिक्षकों की मूल भूमिका दबती जा रही है?

इन घटनाओं ने यह सवाल और भी तेज कर दिया है कि क्या शिक्षकों की प्राथमिक भूमिका—शिक्षण—अब प्रशासनिक जिम्मेदारियों के बोझ तले दब गई है?

यह पहली बार नहीं है।
लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान उत्तर प्रदेश और बिहार में लू से कई मतदान कर्मियों की मौत हुई थी, जिनमें शिक्षक भी शामिल थे।

समस्या आकस्मिक नहीं, संरचनात्मक है

ये घटनाएं स्पष्ट करती हैं कि यह समस्या किसी एक राज्य, एक चुनाव या कुछ व्यक्तियों तक सीमित नहीं है। यह नीतिगत और प्रबंधन स्तर की गंभीर चूक का परिणाम है।

शिक्षक समाज के निर्माणकर्ता होते हैं।
उन पर

  • बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण

  • गुणवत्तापूर्ण शिक्षा

  • राष्ट्र के भविष्य को गढ़ने

जैसी अहम जिम्मेदारियां होती हैं।

लेकिन हकीकत क्या है?

वास्तविकता यह है कि देश का बड़ा शिक्षक वर्ग अपने मूल कार्य—पढ़ाने—में पूरा समय और ऊर्जा नहीं दे पाता, क्योंकि उन्हें लगातार इन कार्यों में लगाया जाता है:

  • चुनावी सेवाएं

  • जनगणना

  • पल्स पोलियो अभियान

  • आधार सत्यापन

  • मध्याह्न भोजन योजना की निगरानी

  • छात्रवृत्ति और सरकारी योजनाओं से जुड़े प्रशासनिक कार्य

अब जरूरी है नीति में बदलाव

यदि शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करना है, तो यह मानना होगा कि
शिक्षक प्रशासनिक कर्मचारी नहीं, बल्कि राष्ट्र के बौद्धिक स्तंभ हैं।
उन्हें गैर-शैक्षणिक कार्यों से मुक्त किए बिना न तो शिक्षा की गुणवत्ता सुधरेगी और न ही शिक्षकों का सम्मान और स्वास्थ्य सुरक्षित रह पाएगा।

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