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उत्तर प्रदेश में शिक्षकों के तबादला आदेश बेअसर नई तैनाती पर कार्यभार न मिलने से वेतन और सेवा प्रभावित

 त्तर प्रदेश के सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों में तबादला नीति एक बार फिर सवालों के घेरे में है। विभाग द्वारा स्थानांतरण आदेश जारी किए जाने के बावजूद कई शिक्षक नई तैनाती पर कार्यभार ग्रहण नहीं कर पा रहे हैं। इससे न सिर्फ शिक्षकों की सेवा बाधित हो रही है, बल्कि वेतन भुगतान और भविष्य की वरिष्ठता पर भी संकट खड़ा हो गया है।

तबादला आदेश के बाद भी कार्यभार नहीं

प्राप्त जानकारी के अनुसार, राज्य के विभिन्न जिलों में स्थानांतरित शिक्षकों को संबंधित विद्यालयों द्वारा जानबूझकर कार्यभार नहीं दिया जा रहा। कुछ मामलों में शिक्षक कार्यमुक्ति प्रमाणपत्र लेकर नई जगह पहुंचे, लेकिन प्रधानाचार्य ने कार्यभार ग्रहण कराने से इनकार कर दिया।

स्थिति यह है कि कई शिक्षक स्कूल परिसर के बाहर खड़े होकर अपनी उपस्थिति सेल्फी, जियो-लोकेशन और प्रार्थना पत्रों के माध्यम से प्रमाणित करने को मजबूर हैं।

बायोमीट्रिक और उपस्थिति पंजिका से नाम हटाने के आरोप

कुछ विद्यालयों में स्थानांतरित शिक्षकों को बायोमीट्रिक मशीन से हटा दिया गया और उपस्थिति पंजिका पर हस्ताक्षर करने से भी रोका गया। इससे शिक्षकों की उपस्थिति संदिग्ध हो गई, जिसका सीधा असर वेतन और सेवा अभिलेखों पर पड़ रहा है।

शिक्षा विभाग की चुप्पी से बढ़ी परेशानी

शिक्षकों द्वारा जिला विद्यालय निरीक्षक, संयुक्त शिक्षा निदेशक और निदेशालय स्तर पर शिकायतें दी गईं, लेकिन लंबे समय तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। इससे यह सवाल उठ रहा है कि जब शासन स्तर से तबादला आदेश जारी हो चुका है, तो विद्यालय स्तर पर उसे रोकने का अधिकार किसे है?

शिक्षक संगठनों ने उठाई मांग

माध्यमिक शिक्षक संगठनों ने मांग की है कि

  • सभी स्थानांतरित शिक्षकों को तुरंत कार्यभार ग्रहण कराया जाए

  • जिन विद्यालयों द्वारा आदेशों की अवहेलना की गई है, उनके विरुद्ध कार्रवाई हो

  • कार्यभार न मिलने की अवधि को कार्यरत अवधि मानते हुए वेतन भुगतान सुनिश्चित किया जाए

प्रशासनिक अव्यवस्था का बड़ा उदाहरण

यह मामला प्रदेश की तबादला प्रक्रिया में गंभीर प्रशासनिक खामियों को उजागर करता है। एक ओर सरकार पारदर्शी स्थानांतरण प्रणाली की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर आदेशों का पालन नहीं हो रहा।

निष्कर्ष

उत्तर प्रदेश में शिक्षकों के तबादला आदेश यदि विद्यालय स्तर पर ही निष्प्रभावी हो जाएं, तो यह न केवल शासन की मंशा पर प्रश्नचिह्न लगाता है बल्कि शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता को भी कमजोर करता है। आवश्यकता है कि शिक्षा विभाग इस समस्या पर तत्काल संज्ञान लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करे, ताकि शिक्षकों को मानसिक, आर्थिक और प्रशासनिक उत्पीड़न से राहत मिल सके।

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