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शिक्षामित्रों की तारीफ में दो शब्द....मैं शिक्षा मित्र हूँ... एक दर्द और बेदना से भरी यह कविता

मैं शिक्षा मित्र हूँ
जब शिक्षक विहीन स्कूल थे
न बच्चे थे,  न विश्वास था
साँसें फुल रही थी, सरकार के
तब हाँ तभी....

तभी तो आया था मैं
एक दीपक बन कर
स्कूल की चारदीवारी में
शिक्षा मित्र बन कर....

हवां नही आंधी से सामना था।
कुकुरमुत्ते जैसे उगे
गांव की गलियों उन स्कूलों से
जो करते शोषण थे
हमारे गाँव के गरीबों का
ये मेरी अग्नि परीक्षा थी
हर झंझावातों से जूझते झुलसते
सिंचित करते अपने गांव के स्कूल को
मै शिक्षा मित्र बन कर.....

आज बच्चे भी हैं
हमारी बगिया में शिक्षक भी है।
लेकिन हम, सुप्रीम कोर्ट में है।
नही नही हम तो तो जड़े हैं
अपने बाग के हर पौधों के
जो फूल देखते हैं वे #फुल हैं
जड़ों को काट कर फूल
बचा सकते हो क्या?
न उजाड़ो मेरे चमन को
मै इस चमन का शिक्षा मित्र हूँ....

आप टेट हैं, आप श्रेष्ठ है
आप भी आएं इस चमन में
उगाए मिल कर अपने गांव के
चंपा चमेली, मौली हरसिंगार को
दिखाएं दुनियाँ को गावों के बहार को
आप और हम मिल कर सिखाएं
गणित के संसार को
कैसे एक और एक दो होते हैं
मैं शिक्षा मित्र हूँ.......
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