उत्तर प्रदेश में शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) को अनिवार्य बनाने के फैसले के खिलाफ राज्य के विभिन्न शिक्षक संगठन एकजुट होकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।
👉 लखनऊ में अखिल भारतीय संयुक्त शिक्षक महासंघ ने कहा है कि वे “सड़क से सदन तक” इस लड़ाई को लड़ेंगे — इसका मतलब है कि सिर्फ प्रदर्शन ही नहीं, बल्कि संसदीय दबाव और बड़े आन्दोलन तक जाने की तैयारी कर रहे हैं।
🧑🏫 शिक्षक आंदोलन का कारण क्या है?
शिक्षक संघों का कहना है कि:
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टीईटी को अनिवार्य करना उन शिक्षकों के लिए अनुचित है जो पहले से सेवा में हैं।
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यह नियम अनुभव और पहले की नियुक्ति को नज़रअंदाज़ करता है।
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कई शिक्षकों का मानना है कि इससे उनकी नौकरी की सुरक्षा और भविष्य प्रभावित होगा।
सुप्रीम कोर्ट का एक हालिया आदेश भी इसी फैसले के पक्ष में आया है, जिसके बाद विरोध और तेज हो गया है।
📍 विरोध का स्वरूप और कार्यक्रम
शिक्षक संघ आंदोलन को चरणबद्ध तरीके से बढ़ा रहे हैं:
✔ सोशल मीडिया अभियान — जैसे ‘Justice for Teacher’ जैसे हैशटैग्स ट्रेंड कर रहे हैं।
✔ काली पट्टी बांधकर शिक्षक अपने समर्थन में विरोध जताएंगे।
✔ 23–25 फरवरी तक काली पट्टी पहनकर कक्षा संचालन और विरोध प्रदर्शन।
✔ 26 फरवरी को जिला मुख्यालयों और बीएसए कार्यालयों पर धरना प्रदर्शन और ज्ञापन सौंपना।
✔ बाद में नई दिल्ली में रामलीला मैदान में एक बड़ा समावेशी प्रदर्शन आयोजित करने की योजना भी है।
इस आंदोलन में शिक्षक संघों की व्यापक भागीदारी देखी जा रही है — जैसे प्राथमिक शिक्षक संघ, जूनियर हाई-स्कूल शिक्षक संघ, बीटीसी शिक्षक संगठन आदि।
📊 विरोध के पीछे शिक्षक संघों की मांग
शिक्षक संघों की मुख्य मांगें:
🟡 2011 से पहले नियुक्त शिक्षकों को टीईटी के नियम से छूट देना।
🟡 अनुभव और सेवा अवधि को प्राथमिकता देना।
🟡 सरकार और केंद्र से इस फैसले को पुनर्विचार करवाना।
लगभग लाखों शिक्षक इस फैसले से प्रभावित हैं, और वे अपनी नौकरी की सुरक्षा और भविष्य के बारे में चिंता जताते आ रहे हैं।
📌 निष्कर्ष
टीईटी को अनिवार्य बनाना शिक्षा विभाग में एक बड़ा नीति परिवर्तन है, लेकिन इसका असर पुराने शिक्षकों की नौकरी की सुरक्षा, मानसिक तनाव और आर्थिक स्थिरता पर पड़ रहा है। इसी कारण शिक्षक संघों ने विरोध को सड़क से संसद के स्तर तक ले जाने की चेतावनी दी है, और उनका आंदोलन आगे बढ़ रहा है।