नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश में 2018 की 69000 सहायक शिक्षक भर्ती मामले में नियुक्ति का इंतजार कर रहे लोगों के लिए एक उम्मीद की किरण फिर जगी है। मंगलवार को उत्तर प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि 9500 और लोगों को नौकरी में समाहित किया जा सकता है। प्रदेश सरकार ने इस संबंध में एक नई सूची तैयार करके हलफनामे के साथ कोर्ट में दाखिल की।
हालांकि, आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों ने प्रदेश सरकार के हलफनामे पर सवाल उठाया और शुरुआत में नौकरी का ऑफर स्वीकार नहीं करने वाले 4946 उम्मीदवारों को फिर नई सूची में शामिल किए जाने पर आपत्ति उठाई। कोर्ट ने भी राज्य सरकार से पूछा कि जिन्हें पहले ऑफर दिया गया था और उन्होंने स्वीकार नहीं किया था तो उन्हें नई सूची में क्यों शामिल किया गया। इस पर राज्य सरकार का कहना था कि कोर्ट कहेगा तो वे उन्हें हटा देंगे, लेकिन वे मेरिट में ऊपर थे इसलिए सूची में शामिल किया। कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें मेरिट पर सुनने की बात कहते हुए मामले को अगले मंगलवार फिर सुनवाई पर लगाने का आदेश दिया है।
इस बीच पक्षकारों को लिखित दलीलें और संक्षिप्त नोट दाखिल करने को कहा गया है। कोर्ट ने कहा, भले ही बहुत सारे पक्षकार हों लेकिन वह दोनों तरफ से पांच-पांच वकीलों और एक वकील अर्जी दाखिल करने वालों की ओर से सुनेगा।
ये निर्देश जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने मामले पर सुनवाई के दौरान दिए। पूर्व सुनवाई में 2020 से नौकरी पाने की कानूनी लड़ाई लड़ रहे आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि उनकी मांग यह नहीं है कि जो लोग नौकरी कर रहे हैं उन्हें हटा दिया जाए, उनकी मांग तो यह है कि उन्हें भी नौकरी दी जाए। वे 2020 से कोर्ट दर कोर्ट भटक रहे हैं।
इस पर कोर्ट ने प्रदेश सरकार से पूछा था कि क्या वह और लोगों को समायोजित कर सकती है। पिछली सुनवाई में प्रदेश सरकार ने कोर्ट को बताया था कि वह उन लोगों को नियुक्ति देने पर विचार करने के लिए राजी है जो हाई कोर्ट की खंडपीठ के 13 अगस्त 2024 के आदेश के अनुसार, मूल चयन सूची में शामिल होने की योग्यता रखते हैं। प्राथमिक शिक्षकों की न्यूनतम योग्यता मानदंडों को पूरा करने और उपलब्ध रिक्तियों के अधीन होगा।
