मित्रों ,हमारे देश के प्रधानमंत्री शिक्षा मंत्री या राज्यों के शिक्षा मंत्रियों ,नीति-नियंता,अधिष्ठाताओं, बुद्धजीवीजनों को ये मानने में झिझक नहीँ करनी चाहिये की हमारा देश विश्वगुरु रहा है और जिसके लिये हमारे देश के ही तत्कालीन राज्य या भाग व य व्यवस्था बधाई के पात्र रहे ।
यहाँ ये बात गौर करने लायक है की उस समय भी पूरे राज्य की व्यवस्था एक सी नहीँ होती थी अपितु कुछ गुरुकुल ही अपने नाम से जाने जाते थे अर्थात शिक्षा गुरु केंद्रित ही रही ।
कुलमिलाकर ,ज्यादा कानून,नियम की ज़रूरत नहीँ ,केवल आर्थिक सहयोग हो जाये ,बाकी पढाई की जिम्मेदारी विद्यालय के हेडमास्टर और उनके सहायक मास्टरों पर छोड़ दिया जाये ।
हर विद्यार्थी अपने में अद्भुत है तब उसको पूर्व निर्धारित तरीके से कैसे पढ़ाया जा सकता है , ये निर्धारण तो मास्टर साहब करें की वो कैसे सीखेगा ,शोधसंस्थान सब बता देंगे पर हर बच्चे के लिये हर नियम नहीँ ,इसके लिये तो विद्यार्थी से सीधे , नियमित रूप से सम्पर्क में आना होता है जो केवल मास्टर साहब ही कर सकते हैं ,कोई सर्वेयर नहीँ ।
कुलमिलाकर मास्टर साहब का काम कोई नहीँ कर सकता ,ये बात सभी अच्छे से समझ लें ।
इसलिये मास्टर साहब का कोई नियंता नहीँ हो सकता ,कम से कम गुणवत्ता में ।
ये बात इसलिये कही है की आजकल देखने में आ रहा है की हमारी सरकारें प्राथमिक शिक्षा के नाम पर विश्व बैंक से धन लाती हैं जबकि उनके अधिकारी एक अघोषित और विचित्र तरीके से इसका बंदरबाँट कर रहे हैं , जिसका नतीजा ये है की शिक्षा का स्तर और गुणवत्ता दोनों नीचे को जा रहे हैं जबकि शिक्षा विभाग के अधिकारियों की सम्पत्ति रॉकेट की द्रुतगति सी एकदम धनवानता का आभास कराने लगती है ।
ये नजारा एबीआरसी से लेकर सचिव स्तर तक देखने को मिलेगा ,वहीँ इन कार्यालयों के चपरासी से लेकर सबसे बड़े साहब तक आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे मिलेंगे और सरकारों के मंत्री खुद को इस विभाग के अयोग्य मानते हुये उदघाटन और बड़े-बड़े भाषण करते जा रहे हैं ।
वर्तमान समय में नया चलन ये है की शिक्षा के लिये मिल रही विश्व बैंक की धनराशि से एक तो शिक्षकों को वेतन देकर उनपर एहसान जताया जा रहा है और शेष धन शैक्षिक उन्नयन गोष्ठियों के नाम पर हज़म किया जा रहा है ।
साथ ही अपने चहेतों को भी कमवाया जाता है । खाया-पिया सब हज़म और नाम हो गया बच्चों की शिक्षा के लिये है सब जबकि खुद का स्वागत-सम्मान और चहेतों का । यही हकीकत है ।
जहाँ के विद्यार्थी ज़मीन पर बैठकर पढ़ने को मजबूर हैं ,वहीँ साहबलोग करोड़ों रुपये मंथन और कार्यशालाओं में खर्च करके अपना विकास कर रहे हैं । और खस्ताहालात के लिये मास्टर साहब को जिम्मेदार बताते हैं ।
तो नीति-नियंताओं से अपील है की शैक्षिक उन्नयन के नाम पर आयोजित होने वाली इन कार्यशालाओं के द्वारा आयोजित लूट पर नियंत्रण लगाईये ,क्योंकि मास्टर साहब को क्या करना है ये उन्हें कोई नहीँ सीखा सकता ।
मास्टर साहब के काम के लिये कोई निर्देश न दे ,जो करना है मास्टर साहब के चयन से पूर्व सिखायें ,भर्ती होने के बाद नहीँ ।
मास्टर साहब को आजाद रखीये और वो जो माँग करें वो संसाधन यथासम्भव मुहैया कराने की कोशिश करें ,बाकी पढ़ाई का काम खुद गुरुजी देख लेंगे ,कम से कम प्राथमिक और पूर्व माध्यमिक स्तर तक ।
वरना मैकाले की अँग्रेजी सरकार और हमारी लोकतांत्रिक सरकार की शिक्षा को लेकर सोच में कोई अंतर न होगा ,मैकाले सोच क्लर्क चाहती थी और ये डिग्री वाले अनपढ़ ।
सरकारों से अनुरोध है की मास्टर साहब को उनका हक दें अर्थात गुरुजी पद की गरिमामय सम्मान होना चाहिये ,उनपर विश्वास किया जाना चाहिये ,यही एकमात्र उपाय है ,क्योंकि किसी भी राष्ट्र की उन्नति का इंडिकेटर वहाँ की प्राथमिक शिक्षा की दशा है , देश का भविष्य ,उसके नौनिहाल गुरुजी के संरक्षण में निर्मित होते हैं ,ऐसे में उनपर अविश्वास किया जाना या आरोप लगाना अपने पैर पर कुल्हाडी मारने जैसा होगा ।
बातें सांकेतिक हैं पर गूढ़ अर्थ से परिपूर्ण हैं , पढ़कर स्थिति और अवस्था पर आत्मविश्लेषण अवश्य करें और विश्वगुरु की अवस्था को भी सोचें । आज बस इतना ही ,शेष फ़िर कभी...
आपका- गणेश शंकर दीक्षित
. टीईटी संघर्ष मोर्चा ,यू.पी.
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कुलमिलाकर ,ज्यादा कानून,नियम की ज़रूरत नहीँ ,केवल आर्थिक सहयोग हो जाये ,बाकी पढाई की जिम्मेदारी विद्यालय के हेडमास्टर और उनके सहायक मास्टरों पर छोड़ दिया जाये ।
हर विद्यार्थी अपने में अद्भुत है तब उसको पूर्व निर्धारित तरीके से कैसे पढ़ाया जा सकता है , ये निर्धारण तो मास्टर साहब करें की वो कैसे सीखेगा ,शोधसंस्थान सब बता देंगे पर हर बच्चे के लिये हर नियम नहीँ ,इसके लिये तो विद्यार्थी से सीधे , नियमित रूप से सम्पर्क में आना होता है जो केवल मास्टर साहब ही कर सकते हैं ,कोई सर्वेयर नहीँ ।
कुलमिलाकर मास्टर साहब का काम कोई नहीँ कर सकता ,ये बात सभी अच्छे से समझ लें ।
इसलिये मास्टर साहब का कोई नियंता नहीँ हो सकता ,कम से कम गुणवत्ता में ।
ये बात इसलिये कही है की आजकल देखने में आ रहा है की हमारी सरकारें प्राथमिक शिक्षा के नाम पर विश्व बैंक से धन लाती हैं जबकि उनके अधिकारी एक अघोषित और विचित्र तरीके से इसका बंदरबाँट कर रहे हैं , जिसका नतीजा ये है की शिक्षा का स्तर और गुणवत्ता दोनों नीचे को जा रहे हैं जबकि शिक्षा विभाग के अधिकारियों की सम्पत्ति रॉकेट की द्रुतगति सी एकदम धनवानता का आभास कराने लगती है ।
ये नजारा एबीआरसी से लेकर सचिव स्तर तक देखने को मिलेगा ,वहीँ इन कार्यालयों के चपरासी से लेकर सबसे बड़े साहब तक आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे मिलेंगे और सरकारों के मंत्री खुद को इस विभाग के अयोग्य मानते हुये उदघाटन और बड़े-बड़े भाषण करते जा रहे हैं ।
वर्तमान समय में नया चलन ये है की शिक्षा के लिये मिल रही विश्व बैंक की धनराशि से एक तो शिक्षकों को वेतन देकर उनपर एहसान जताया जा रहा है और शेष धन शैक्षिक उन्नयन गोष्ठियों के नाम पर हज़म किया जा रहा है ।
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साथ ही अपने चहेतों को भी कमवाया जाता है । खाया-पिया सब हज़म और नाम हो गया बच्चों की शिक्षा के लिये है सब जबकि खुद का स्वागत-सम्मान और चहेतों का । यही हकीकत है ।
जहाँ के विद्यार्थी ज़मीन पर बैठकर पढ़ने को मजबूर हैं ,वहीँ साहबलोग करोड़ों रुपये मंथन और कार्यशालाओं में खर्च करके अपना विकास कर रहे हैं । और खस्ताहालात के लिये मास्टर साहब को जिम्मेदार बताते हैं ।
तो नीति-नियंताओं से अपील है की शैक्षिक उन्नयन के नाम पर आयोजित होने वाली इन कार्यशालाओं के द्वारा आयोजित लूट पर नियंत्रण लगाईये ,क्योंकि मास्टर साहब को क्या करना है ये उन्हें कोई नहीँ सीखा सकता ।
मास्टर साहब के काम के लिये कोई निर्देश न दे ,जो करना है मास्टर साहब के चयन से पूर्व सिखायें ,भर्ती होने के बाद नहीँ ।
मास्टर साहब को आजाद रखीये और वो जो माँग करें वो संसाधन यथासम्भव मुहैया कराने की कोशिश करें ,बाकी पढ़ाई का काम खुद गुरुजी देख लेंगे ,कम से कम प्राथमिक और पूर्व माध्यमिक स्तर तक ।
वरना मैकाले की अँग्रेजी सरकार और हमारी लोकतांत्रिक सरकार की शिक्षा को लेकर सोच में कोई अंतर न होगा ,मैकाले सोच क्लर्क चाहती थी और ये डिग्री वाले अनपढ़ ।
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बातें सांकेतिक हैं पर गूढ़ अर्थ से परिपूर्ण हैं , पढ़कर स्थिति और अवस्था पर आत्मविश्लेषण अवश्य करें और विश्वगुरु की अवस्था को भी सोचें । आज बस इतना ही ,शेष फ़िर कभी...
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