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शासनादेश को नकारकर मूल विद्यालयों से अलग हो रही शिक्षामित्रों की तैनाती

केस-1
शाहजहांपुर की शिक्षामित्र अनुभा वर्मा को समायोजन के बाद बंडा ब्लॉक का लालपुर आजाद स्कूल मिला था। अब वे इसी ब्लॉक के ग्राम पटनी स्थित अपने मूल स्कूल में जाना चाहती हैं।
लेकिन वहां के बीएसए उन पर किसी और स्कूल में जाने का विकल्प देने का दबाव बना रहे हैं। शिक्षा निदेशालय को भेजी रिपोर्ट में शाहजहांपुर में शिक्षामित्रों की तैनाती शासनादेश के तहत करने की बात कही गई है, लेकिन अनुभा के मामले से हकीकत समझी जा सकती है।

केस-2
लखनऊ के धर्मेंद्र कुमार वर्तमान में माल ब्लॉक के प्राथमिक विद्यालय बनेवा पुरवा में तैनात हैं। समायोजन रद्द होने के बाद उन्होंने चिनहट स्थित अपने मूल विद्यालय लौलाई-2 में जाने का विकल्प दिया है। लेकिन अब तक उन्हें मूल विद्यालय में नहीं भेजा गया है। शिक्षामित्र संगठनों का कहना है कि लखनऊ जिले में ही इस तरह के 600 मामले हैं।

सुप्रीम कोर्ट से समायोजन रद्द होने के बाद शिक्षामित्रों की तैनाती के ये मामले तो सिर्फ बानगी हैं। प्रदेश में ऐसे प्रकरणों की संख्या हजारों में बताई जा रही है। जिलों में बीएसए शिक्षामित्रों की तैनाती में इस कदर मनमानी कर रहे हैं कि उन पर डिप्टी सीएम डॉ. दिनेश शर्मा के कड़ी कार्रवाई की चेतावनी का भी कोई खौफ नहीं है।

शासन ने समायोजन रद्द होने के बाद शिक्षामित्रों को यह सुविधा दी है कि वे या तो वर्तमान विद्यालय में रहें या अपने मूल विद्यालय में वापस चले जाएं। महिला शिक्षामित्रों को ससुराल वाले गांव में भी तैनाती की सुविधा दी गई है।

इस बारे में जारी शासनादेश के मुताबिक पूरे प्रदेश में यह कार्यवाही 5 अगस्त तक पूरी हो जानी चाहिए थी। लेकिन इस पर कहीं अमल नहीं हो रहा है। बाराबंकी में भी करीब 188 शिक्षामित्रों को उनके मूल विद्यालयों में नहीं भेजा गया है। कमोवेश यह स्थित सभी जिलों की है।

कई जिलों में बीएसए पर मूल विद्यालयों में तैनाती के एवज में सुविधा शुल्क मांगने के भी आरोप हैं। शिक्षामित्रों का कहना है कि उन्हें दस हजार रुपये मानदेय मिल रहा है। लेकिन उनकी तैनाती घर से 50-80 किमी दूर है। नतीजतन उनके मानदेय का ज्यादातर हिस्सा आने-जाने में ही खर्च हो जाता है।

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