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शिक्षामित्रों के 12 सितम्बर 2015 के हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट का नज़रिया

12 सितम्बर 2015 के हाई कोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट का नज़रिया। 2 नवम्बर 2015 को 12 सितम्बर 2015 का फैसला आ जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा *there will be a confusion.*
जो हाई कोर्ट की पूर्ण पीठ ने इतनी बड़ी संख्या में नियुक्त शिक्षामित्रों का समायोजन रद्द कर दिया।

अब जबकि नवम्बर में पुनः सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई है ऐसे में कोर्ट पैर्विकारों का एक मात्र लक्ष्य कोर्ट के कंफ्यूज़न को दूर करना होना चाहिए।
लेकिन अब तक इस दिशा में कोई प्रयास नहीं किया गया है।
*कोर्ट का कंफ्यूज़न क्या है?*
हाई कोर्ट की पूर्ण पीठ को ये कंफ्यूज़न था कि *शिक्षामित्र एक योजना के अंतर्गत नियुक्त सामुदायिक सेवाकर्मी हैं या संविदा शिक्षक हैं या फिर अप्रशिक्षित अध्यापक जो प्रशिक्षित हो चुके हैं।*
और इसी कंफ्यूज़न को विपक्षी बेरोज़गारों ने और बढ़ाया और शिक्षामित्रों को कोर्ट से सामुदायिक सेवाकर्मी सिद्ध करवा दिया।
उस समय कोर्ट में पैरवी कर रही राज्य सरकार और शिक्षामित्र संघ और टीम भी इस कंफ्यूज़न को दूर करने में नाकाम रहे। और शिक्षामित्रों का समायोजन रद्द हो गया।
*क्या अब भी ये कंफ्यूज़न दूर हो सकता है?*
जी हाँ। ये कंफ्यूज़न अब भी दूर हो सकता है। इसे दूर करने के लिए मिशन सुप्रीम कोर्ट समूह के रबी बहार, केसी सोनकर और साथियों द्वारा अपने अथक प्रयासों से ठोस साक्ष्य और विधिक तथ्य जमा किये गए हैं।
ताकि कोर्ट का कंफ्यूज़न दूर हो। इन साक्ष्यों को कोर्ट के समक्ष रखने के लिए अलग से याचिका की तैयारी है। *जिस के लिए जागरूक शिक्षामित्रों का सहयोग आपेक्षित है।
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