नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें यूपी के बेसिक एजुकेशन रूल के 15 वें व 16 वें संशोधन को रद कर दिया था।
याचिकाकर्ता के वकील आरके सिंह ने बताया कि आरटीई के मुताबिक राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) का कहना था कि टीईटी के नंबरों का वेटेज अनिवार्य नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि राज्य सरकार ने बेसिक एजुकेशन रूल्स 1991 में जो 15 वां संशोधन किया था, वह एनसीटीई के नियम के विपरीत नहीं है। ऐसे में कानूनी तौर पर इन शिक्षकों की भर्ती सही है।
एनसीटीई का पैमाना बाध्यकारी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नैशनल काउंसिल फॉर टीचर्स एजुकेशन (एनसीटीई) शैक्षणिक अथॉरिटी है। इसे शिक्षा के अधिकार के तहत बनाया गया है। एनसीटीई ने 2 सितंबर 2016 को कोर्ट को बताया था कि शिक्षकों के लिए टीईटी परीक्षा पास करना जरूरी है, लेकिन राज्य सरकार के लिए यह जरूरी नहीं है कि वह टीईटी के नंबर को वरीयता दे। टीईटी सिर्फ टीचर बनने की योग्यता भर है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे में राज्य सरकार की जिम्मेदारी है कि वह इसके विपरीत नियम न बनाए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि एनसीटीई ने योग्यता का जो पैमाना तय किया है, वह बाध्यकारी है।
कहा-यदि टीईटी पास कर लें तो सरकार सहायक टीचरों की होने वाली दो भर्तियों में दे सकती है मौका
एनबीटी ब्यूरो, नई दिल्ली
शिक्षामित्रों का सहायक शिक्षकों के पदों पर समायोजन रद करने के इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में शिक्षामित्रों को यह राहत दी है कि अगर वे टीईटी पास कर लेते हैं, तो राज्य सरकार सहायक टीचर की होने वाली दो लगातार भर्तियों में उन पर विचार कर सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि शिक्षामित्रों को असिस्टेंट टीचर के तौर पर नियुक्ति के मामले में कुछ छूट दी जा सकती है मसलन उम्र और उनके अनुभव पर विचार हो सकता है, लेकिन असिस्टेंट टीचर के तौर पर उन्हें सीधे नियमित नहीं किया जा सकता था।
कोर्ट ने कहा कि सवाल है कि किसी अधिकार के बिना शिक्षामित्र रिलीफ के हकदार हो सकते हैं/ ऐसी विशेष स्थिति में उन्हें दो बार लगातार भर्तियों में अवसर दिया जाए। अगर वे टीईटी पास हैं या पास कर लेते हैं तो सहायक शिक्षकों की दो भर्तियों में उन पर विचार किया जा सकता है। राज्य सरकार को इस बात का भी अधिकार है कि अगर वह चाहे तो शिक्षामित्रों की सेवा बतौर शिक्षामित्र जारी रख सकती है। इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ यूपी सरकार और शिक्षामित्रों की ओर से अपील दाखिल की गई थी।

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याचिकाकर्ता के वकील आरके सिंह ने बताया कि आरटीई के मुताबिक राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) का कहना था कि टीईटी के नंबरों का वेटेज अनिवार्य नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि राज्य सरकार ने बेसिक एजुकेशन रूल्स 1991 में जो 15 वां संशोधन किया था, वह एनसीटीई के नियम के विपरीत नहीं है। ऐसे में कानूनी तौर पर इन शिक्षकों की भर्ती सही है।
एनसीटीई का पैमाना बाध्यकारी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नैशनल काउंसिल फॉर टीचर्स एजुकेशन (एनसीटीई) शैक्षणिक अथॉरिटी है। इसे शिक्षा के अधिकार के तहत बनाया गया है। एनसीटीई ने 2 सितंबर 2016 को कोर्ट को बताया था कि शिक्षकों के लिए टीईटी परीक्षा पास करना जरूरी है, लेकिन राज्य सरकार के लिए यह जरूरी नहीं है कि वह टीईटी के नंबर को वरीयता दे। टीईटी सिर्फ टीचर बनने की योग्यता भर है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे में राज्य सरकार की जिम्मेदारी है कि वह इसके विपरीत नियम न बनाए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि एनसीटीई ने योग्यता का जो पैमाना तय किया है, वह बाध्यकारी है।
कहा-यदि टीईटी पास कर लें तो सरकार सहायक टीचरों की होने वाली दो भर्तियों में दे सकती है मौका
एनबीटी ब्यूरो, नई दिल्ली
शिक्षामित्रों का सहायक शिक्षकों के पदों पर समायोजन रद करने के इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में शिक्षामित्रों को यह राहत दी है कि अगर वे टीईटी पास कर लेते हैं, तो राज्य सरकार सहायक टीचर की होने वाली दो लगातार भर्तियों में उन पर विचार कर सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि शिक्षामित्रों को असिस्टेंट टीचर के तौर पर नियुक्ति के मामले में कुछ छूट दी जा सकती है मसलन उम्र और उनके अनुभव पर विचार हो सकता है, लेकिन असिस्टेंट टीचर के तौर पर उन्हें सीधे नियमित नहीं किया जा सकता था।
कोर्ट ने कहा कि सवाल है कि किसी अधिकार के बिना शिक्षामित्र रिलीफ के हकदार हो सकते हैं/ ऐसी विशेष स्थिति में उन्हें दो बार लगातार भर्तियों में अवसर दिया जाए। अगर वे टीईटी पास हैं या पास कर लेते हैं तो सहायक शिक्षकों की दो भर्तियों में उन पर विचार किया जा सकता है। राज्य सरकार को इस बात का भी अधिकार है कि अगर वह चाहे तो शिक्षामित्रों की सेवा बतौर शिक्षामित्र जारी रख सकती है। इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ यूपी सरकार और शिक्षामित्रों की ओर से अपील दाखिल की गई थी।

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