लखनऊ : उत्तर प्रदेश कोआपरेटिव बैंक के भ्रष्टाचार के चलते एमडी के
निलंबन और 50 सहायक प्रबंधकों की नियुक्ति निरस्त करने के फरमान के बाद अब
सहकारिता विभाग के गड़े मुर्दे उखड़ने लगे हैं। अब उत्तर प्रदेश सहकारी के
1200 अक्षम कर्मियों पर छंटनी की तलवार लटक गई है।
विभाग के स्तर पर इसका
प्रस्ताव तैयार किया गया है। खासकर सपा सरकार में हुई भर्तियों पर नजर टिकी
है। 1प्रमुख सचिव सहकारिता और आयुक्त व निबंधक एमवीएस रामी रेड्डी की
अध्यक्षता में कुछ समय पहले हुई समीक्षा बैठक में उप्र सहकारी की जर्जर
स्थिति और चुनौतियों से निपटने के लिए यह सुझाव आया। बैठक में यह बात आई कि
बैंक की शाखाओं को कम करने के दृष्टिकोण से नाबार्ड के उच्चाधिकारियों के
साथ विमर्श कर एक कमेटी बनाई जाए। कम से कम 50 शाखाएं जिनका जिनका व्यवसाय
और लाभ न्यूनतम है, उसे दूसरी शाखाओं में मर्ज कराने की प्रक्रिया अपनाने
पर जोर दिया गया। खास यह है कि बैंक में 3040 कर्मचारी कार्यरत हैं और
प्रबंधकीय व्यय ज्यादा है। एक तरफ बैंक पर खर्च अधिक है और ज्यादा
कार्मिकों के सापेक्ष व्यवसाय में वृद्धि भी नहीं हो रही है। ऐसी स्थिति
में करीब 1200 अक्षम कर्मचारियों की पहचान कर उन्हें सेवा से कार्यमुक्त
करने के लिए विधिक कार्यवाही अपनाने की रणनीति बन रही है। इस सिलसिले में
अगर जरूरत पड़े तो नाबार्ड से भी विचार विमर्श किया जाए। रामी रेड्डी ने यह
प्रस्ताव भी तैयार किया है। योगी सरकार समाजवादी पार्टी की सरकार में
सहकारिता में हुई भर्तियों की एसआइटी जांच करा रही है। आरोप है कि इस बैंक
में भी 2015-16 और 2016-17 में नियमों की अनदेखी करते हुए भारी धन उगाही कर
भर्ती की गई। यह भर्ती तब हुई जब बैंक पहले से ही 160 करोड़ के घाटे में
चल रहा था। अब जबकि बैंक में करीब 180 करोड़ सालाना केवल वेतन पर खर्च हो
रहे हैं तो मुनाफे को लेकर अफसरों के होश उड़ गये हैं।
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