22 फरबरी का दिन बेरोजगारों के लिए निर्णायक हो सकता है,परन्तु जो परिस्थितियां कृत्रिम रूप से तैयार की जा रही है वो अंत्यत विस्फोटक है।
हिमांशू सहित उनमे विकट आस्था रखने वाले लोगो को इस पर विचार करना होगा कि जो व्यक्ति इनकी याचिका पर ही जॉब पाकर और कथित रूप से कोर्ट में मजबूत मुद्दा न होने के बावजूद भी आज जिले जिले मीटिंग कर याचिओ से निगाह मिला कर बात कर पा रहा है वहीँ सम्पूर्ण समायोजन व् शिक्षा मित्र नाशक का सेहरा सिर पर सजाये नेता जी मेरठ के याचिओ से ही निगाह नही मिला पा रहे है।
यदि राणा ने नौकरी व् पैसो के लिए एक बड़े संगठन से दुश्मनी मोल ली है तो मेरी समझ से ये घाटे का सौदा तब जरूर है जब आप जिस समूह के लिए लड़े उसका भी विश्वाश खो दें,शिक्षा मित्रों को छीक भी आती है तो राणा को ही कोसते है तो जब नौकरी जायेगी तो कल्पना ही की जा सकती है।सोचना,7 दिसम्बर के उपरांत यदि धन के बजाय पैरवी पर ध्यान होता तो खाते में हिमांशू के नाम से 5 दिन में दसियों लाख आ चुके होते।जिस गद्दारी के लिए हिमांशु को नौकरी व् धन का लालच देकर उद्धत किया जा रहा है उससे इनकी स्थिति धोबी के कुत्ते जैसी होगी,क्योंकि 91 पेज के आदेश को भी काटा नही जा सकता और इधर बी एड बेरोजगार भी इस गद्दारी को अंततः समझ ही जायेंगे।
जिस तरह हिमांशू राणा ने अपनी बनी बनायी छवि पर दुसरो के प्रभाव में आकर बट्टा लगाया है इसके उदाहरण कम ही मिलते है।सलाहकार चाणक्य हो तो आप विश्वविजेता बन सकते है और शकुनि हो तो वंश नाश करवा लेंगे।
उधर एक अचयनित नेता भी अपनी बनी बनायी इमेज को धूल धूसरित करने में लगे है।समस्या इससे नही है ,बात इतनी भर है कि आप मुर्ख हो और अपनी इस मूर्खता में लोगो से खेलना चाहते हो....इन्होंने एक ऐसे वकील को चेक दी है जो चयनित और तदर्थ चयनितों के फैमली टाइप वकील है ,मजे की बात है कि सीनियर की ब्रीफिंग भी यही फैमली वकील करेंगे।अब इससे अचयनित याचिओ को कुछ मिले न मिले 72825 और 841 पर आंच नही आएगी.... है न।
जिन भाइयों के कलाकारी में फंसे हो उन्होंने हीरो को भी जीरो बना दिया तुम तो कॉमेडियन भी नही हो।तो भाइयो है न ये कमाल के ढक्कन....
और हाँ ये बकरी की तरह तब मिमियाना जब 21 को सिर पर पड़ें।
बिसात जो बिछायी जा रही है उसमें सिर्फ धन ही प्राथमिकता में है वो चाहे विरोधी से हाथ मिलाने से आये य फिर भय के व्यापार से,,,,
क्या कारण रहा कि 7 दिसम्बर के उपरांत अथाह धन आने के बावजूद शिक्षा मित्र मुद्दे पर ऐसा वकील नही खड़ा हुआ जो जज की आंख में आँख डालकर अपनी बात रख सके ?
क्या ये इनकी कुटिलता नही कि जियो कांड के बाद चोरी का पूरा आरोप सेंगर के मत्थे मढ़ दिया?
यदि 40 ये 60 लाख था तो उसका बेहतर इस्तेमाल क्यों नही किया गया?
राह में सेंगर रोड़ा था तो प्रदेश को वक़्त रहते क्यों नही बताया गया?
आप इन प्रश्नों के उत्तर में इनकी कुटिलता खोजिये मैं चला सोने...
जोकर हो सकता हूँ हरामखोर नही।
शब्बा खैर
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हिमांशू सहित उनमे विकट आस्था रखने वाले लोगो को इस पर विचार करना होगा कि जो व्यक्ति इनकी याचिका पर ही जॉब पाकर और कथित रूप से कोर्ट में मजबूत मुद्दा न होने के बावजूद भी आज जिले जिले मीटिंग कर याचिओ से निगाह मिला कर बात कर पा रहा है वहीँ सम्पूर्ण समायोजन व् शिक्षा मित्र नाशक का सेहरा सिर पर सजाये नेता जी मेरठ के याचिओ से ही निगाह नही मिला पा रहे है।
यदि राणा ने नौकरी व् पैसो के लिए एक बड़े संगठन से दुश्मनी मोल ली है तो मेरी समझ से ये घाटे का सौदा तब जरूर है जब आप जिस समूह के लिए लड़े उसका भी विश्वाश खो दें,शिक्षा मित्रों को छीक भी आती है तो राणा को ही कोसते है तो जब नौकरी जायेगी तो कल्पना ही की जा सकती है।सोचना,7 दिसम्बर के उपरांत यदि धन के बजाय पैरवी पर ध्यान होता तो खाते में हिमांशू के नाम से 5 दिन में दसियों लाख आ चुके होते।जिस गद्दारी के लिए हिमांशु को नौकरी व् धन का लालच देकर उद्धत किया जा रहा है उससे इनकी स्थिति धोबी के कुत्ते जैसी होगी,क्योंकि 91 पेज के आदेश को भी काटा नही जा सकता और इधर बी एड बेरोजगार भी इस गद्दारी को अंततः समझ ही जायेंगे।
जिस तरह हिमांशू राणा ने अपनी बनी बनायी छवि पर दुसरो के प्रभाव में आकर बट्टा लगाया है इसके उदाहरण कम ही मिलते है।सलाहकार चाणक्य हो तो आप विश्वविजेता बन सकते है और शकुनि हो तो वंश नाश करवा लेंगे।
उधर एक अचयनित नेता भी अपनी बनी बनायी इमेज को धूल धूसरित करने में लगे है।समस्या इससे नही है ,बात इतनी भर है कि आप मुर्ख हो और अपनी इस मूर्खता में लोगो से खेलना चाहते हो....इन्होंने एक ऐसे वकील को चेक दी है जो चयनित और तदर्थ चयनितों के फैमली टाइप वकील है ,मजे की बात है कि सीनियर की ब्रीफिंग भी यही फैमली वकील करेंगे।अब इससे अचयनित याचिओ को कुछ मिले न मिले 72825 और 841 पर आंच नही आएगी.... है न।
जिन भाइयों के कलाकारी में फंसे हो उन्होंने हीरो को भी जीरो बना दिया तुम तो कॉमेडियन भी नही हो।तो भाइयो है न ये कमाल के ढक्कन....
और हाँ ये बकरी की तरह तब मिमियाना जब 21 को सिर पर पड़ें।
बिसात जो बिछायी जा रही है उसमें सिर्फ धन ही प्राथमिकता में है वो चाहे विरोधी से हाथ मिलाने से आये य फिर भय के व्यापार से,,,,
क्या कारण रहा कि 7 दिसम्बर के उपरांत अथाह धन आने के बावजूद शिक्षा मित्र मुद्दे पर ऐसा वकील नही खड़ा हुआ जो जज की आंख में आँख डालकर अपनी बात रख सके ?
क्या ये इनकी कुटिलता नही कि जियो कांड के बाद चोरी का पूरा आरोप सेंगर के मत्थे मढ़ दिया?
यदि 40 ये 60 लाख था तो उसका बेहतर इस्तेमाल क्यों नही किया गया?
राह में सेंगर रोड़ा था तो प्रदेश को वक़्त रहते क्यों नही बताया गया?
आप इन प्रश्नों के उत्तर में इनकी कुटिलता खोजिये मैं चला सोने...
जोकर हो सकता हूँ हरामखोर नही।
शब्बा खैर
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