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मोबाइल: सुविधा से ज़्यादा टेंशन की सौगात

मोबाइल: सुविधा से ज़्यादा टेंशन की सौगात

मोबाइल की सबसे बड़ी देन क्या है?
मेरी नज़र में — टेंशन

आज मोबाइल ने दुनिया को हमारी मुट्ठी में तो ला दिया है, लेकिन उसी के साथ परेशानियों का बोझ भी दिमाग पर रख दिया है। कोई इंसान हजार किलोमीटर दूर रहकर मेहनत से कमाई कर रहा है और घर से फोन आता है—
“बच्चे की उंगली में चोट लग गई।”
“आज गाय ने दूध नहीं दिया।”
“आज तुम्हारी माँ ने मुझे खरी-खोटी सुना दी।”

यानी जो समस्याएँ पहले मौके पर ही सुलझ जाती थीं, वे अब तुरंत कॉल बनकर टेंशन में बदल जाती हैं।

स्टेटस और पोस्ट की बीमारी

आज एक छोटा-सा स्टेटस लगाओ और सौ लोगों का एक साथ दिमाग खराब।
एक सोशल मीडिया पोस्ट डालो और हजारों लोग बिना पूरी बात जाने राय देने लगते हैं।
हर किसी को सब कुछ जानने और बताने की जल्दी है।

रिश्तों पर मोबाइल का असर

रिश्तों में धोखा बढ़ना भी कहीं न कहीं मोबाइल की देन है।
मोबाइल ने शक को जन्म दिया, तुलना को बढ़ावा दिया और संवाद की जगह स्क्रीन ने ले ली।
रिश्ते टूटने का एक बड़ा कारण भी आज मोबाइल बन चुका है।

खबरों की रफ्तार, सुकून की कमी

अब दो मिनट में हर खबर रिश्तेदारों तक पहुँच जाती है—
कौन बीमार है, कौन नाराज़ है, किस घर में क्या हुआ।
पहले बात धीरे-धीरे फैलती थी, अब टेंशन बिजली की रफ्तार से फैलती है।

जब मोबाइल नहीं था…

जब मोबाइल नहीं था, तब सचमुच टेंशन बहुत कम थी।
लोग आमने-सामने बैठकर बात करते थे,
मन हल्का रहता था और नींद गहरी आती थी।

मोबाइल बुरा नहीं है,
लेकिन उसका ज़रूरत से ज़्यादा इस्तेमाल हमें अंदर से बेचैन बना रहा है।
शायद अब वक्त है कि हम मोबाइल को अपनी ज़िंदगी का साधन बनाएँ,
ज़िंदगी का मालिक नहीं।


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