27 फरवरी 2026 को उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले में Teachers Federation of India (TFI) के नेतृत्व में सैकड़ों शिक्षक-शिक्षिकाएं सड़क पर उतर आए। बीएसए (Basic Shiksha Adhikari) कार्यालय परिसर में आयोजित इस धरना-प्रदर्शन में उनकी एक ही मांग थी — वर्ष 2011 से पहले नियुक्त शिक्षकों पर TET (शिक्षक पात्रता परीक्षा) लागू न की जाए।
यह प्रदर्शन केवल बदायूं तक सीमित नहीं है। पूरे उत्तर प्रदेश में शिक्षक समुदाय इस मुद्दे पर एकजुट होकर अपनी आवाज उठा रहा है।
TET क्या है और यह विवाद क्यों है?
TET यानी Teacher Eligibility Test — यह एक पात्रता परीक्षा है जो यह सुनिश्चित करती है कि किसी शिक्षक के पास पढ़ाने की न्यूनतम योग्यता है। Right to Education (RTE) Act 2009 के तहत यह परीक्षा अनिवार्य की गई, जो उत्तर प्रदेश में 2011 से लागू हुई।
विवाद यहीं से शुरू होता है:
- 2011 से पहले नियुक्त शिक्षकों की भर्ती उस समय के नियमों और मानदंडों के अनुसार हुई थी।
- अब सर्वोच्च न्यायालय के एक आदेश के बाद इन पुराने शिक्षकों पर भी TET अनिवार्य करने की बात उठ रही है।
- शिक्षकों का तर्क है कि जो कानून 2011 में बना, उसे 2011 से पहले की नियुक्तियों पर कैसे लागू किया जा सकता है?
शिक्षकों के मुख्य तर्क
1. पूर्वव्यापी कानून का विरोध
TFI के राष्ट्रीय सचिव संजीव शर्मा का कहना है: "विश्व में ऐसा कोई कानून नहीं है जिसे उसके बनने से पहले की नियुक्तियों पर लागू किया जाए।" यह कानून के मूल सिद्धांत के विरुद्ध है।
2. दशकों का अनुभव बनाम एक परीक्षा
जो शिक्षक 20 से 25 वर्षों से बच्चों को पढ़ा रहे हैं, उन्हें अचानक किसी परीक्षा में बैठाकर उनकी योग्यता परखना न केवल अपमानजनक है बल्कि अव्यावहारिक भी है।
3. नौकरी का संकट
TET पास न करने पर इन शिक्षकों की नौकरी जाने का खतरा है, जो उनके परिवारों की आजीविका को सीधे प्रभावित करता है।
धरने से डीएम दफ्तर तक — कैसे आगे बढ़ा आंदोलन?
बदायूं में धरना देने के बाद महिला शिक्षिकाओं के नेतृत्व में पूरा जत्था पैदल मार्च करते हुए डीएम कार्यालय पहुंचा। वहां प्रधानमंत्री को संबोधित ज्ञापन सिटी मजिस्ट्रेट सुरेश पाल को सौंपा गया।
उत्तर प्रदेश महिला शिक्षक संघ ने भी इस विरोध में अपना समर्थन जताया। जिलाध्यक्ष किरण सिंह सिसोदिया ने प्रधानमंत्री और केंद्रीय शिक्षा मंत्री को अलग से ज्ञापन भेजा।
RTE Act 2011 क्या कहता है?
Right to Education Act के अनुसार:
- 6 से 14 वर्ष के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार है।
- प्राथमिक और उच्च प्राथमिक कक्षाओं में पढ़ाने के लिए TET पास होना 2011 के बाद की नियुक्तियों के लिए अनिवार्य किया गया।
- कानून में पहले से नियुक्त शिक्षकों को एक निश्चित समयसीमा में प्रशिक्षण पूरा करने का अवसर दिया गया था — TET पास करने की शर्त नहीं।
यही वह कानूनी आधार है जिस पर शिक्षक अपना विरोध टिकाए हुए हैं।
इस मुद्दे पर दोनों पक्षों को समझें
| पक्ष | तर्क |
|---|---|
| शिक्षकों का पक्ष | 2011 से पहले की नियुक्तियों पर TET लागू करना पूर्वव्यापी और अन्यायपूर्ण है |
| नीति-निर्माताओं का पक्ष | गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए सभी शिक्षकों की योग्यता सुनिश्चित होनी चाहिए |
आगे क्या होगा?
यह आंदोलन तब तक जारी रहने की संभावना है जब तक सरकार या न्यायालय इस मामले में स्पष्ट निर्देश नहीं देते। शिक्षक संगठनों ने संकेत दिया है कि यदि उनकी बात नहीं सुनी गई तो वे राज्यव्यापी हड़ताल का भी रास्ता अपना सकते हैं।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को एक मध्यमार्ग निकालना होगा — जिसमें पुराने शिक्षकों के अनुभव का सम्मान हो और शिक्षा की गुणवत्ता भी सुनिश्चित हो सके।
निष्कर्ष
बदायूं का यह प्रदर्शन एक बड़े सवाल की ओर ध्यान दिलाता है — क्या न्याय का अर्थ केवल नियम लागू करना है, या उन लोगों की परिस्थितियों को समझना भी है जो उन नियमों के बनने से पहले से सेवा में हैं?
शिक्षकों की मांग जायज लगती है। जो व्यक्ति दो दशकों से कक्षाओं में पढ़ा रहा है, उसकी योग्यता पर एक परीक्षा के जरिए सवाल उठाना न केवल उसके आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाता है बल्कि शिक्षा व्यवस्था में भी अनिश्चितता पैदा करता है।
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