नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को जनगणना-2027 में जाति की गणना को लेकर एक अहम टिप्पणी करते हुए केंद्र सरकार और भारत के जनगणना आयुक्त से कहा है कि सिर्फ स्व-घोषणा के बजाय सत्यापन आधारित प्रणाली पर विचार किया जाना चाहिए।
हालांकि, अदालत ने जनगणना में नागरिकों की जाति से संबंधित आंकड़ों को दर्ज करने, वर्गीकृत करने और सत्यापित करने की प्रक्रिया को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया और उसे निस्तारित कर दिया।
🔹 सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने क्या कहा?
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि:
👉 याचिका में कुछ प्रासंगिक और महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए गए हैं
👉 ऐसे सुझावों पर सक्षम प्राधिकारियों को जनगणना अधिनियम, 1958 के तहत विचार करना चाहिए
पीठ ने स्पष्ट किया कि जनगणना की प्रक्रिया:
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जनगणना अधिनियम, 1958
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और उसके तहत बने 1990 के नियमों
के अनुसार संचालित होती है, जिनमें जनगणना के तौर-तरीके तय करने का अधिकार संबंधित प्राधिकारियों को दिया गया है।
🔹 जाति आंकड़ों पर पहले से तय कोई प्रारूप नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता एवं शिक्षाविद आकाश गोयल से कहा कि:
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जाति संबंधी आंकड़ों की पहचान के लिए
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पहले से तय कोई निश्चित प्रारूप या आंकड़ा मौजूद नहीं है
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने यह भी कहा कि:
“इस बात पर संदेह का कोई कारण नहीं है कि याचिकाकर्ता द्वारा जताई गई आशंकाओं को ध्यान में रखते हुए महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त कार्यालय ने पहले से ही एक मजबूत व्यवस्था विकसित कर रखी होगी।”
🔹 याचिकाकर्ता की प्रमुख मांगें
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुक्ता गुप्ता ने अदालत में दलील दी कि:
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जाति संबंधी विवरण दर्ज करने
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वर्गीकरण और सत्यापन के लिए
👉 एक पारदर्शी प्रश्नपत्र (Questionnaire) सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराया जाना चाहिए
अदालत ने इन सुझावों को महापंजीयक को दिए गए प्रतिवेदन का हिस्सा मानते हुए उन पर विचार करने को कहा, लेकिन याचिका पर अलग से सुनवाई से इनकार कर दिया।
🔹 चुनाव प्रक्रिया पर भी सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
इसी दिन सुप्रीम कोर्ट ने एक अन्य महत्वपूर्ण मामले में कहा कि:
👉 व्यक्तिगत शिकायत के आधार पर चुनाव प्रक्रिया को नहीं रोका जा सकता
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि:
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चुनाव से जुड़ी व्यक्तिगत शिकायतों का
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एकमात्र और अंतिम उपाय चुनाव याचिका है
यह टिप्पणी उत्तराखंड हाईकोर्ट के जुलाई 2025 के एक अंतरिम आदेश को चुनौती देने वाली अपील पर की गई।
🔹 चुनाव अधिकार वैधानिक प्रकृति का
शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि:
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चुनाव लड़ने या उसे चुनौती देने का अधिकार
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वैधानिक प्रकृति का होता है
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और इसका प्रयोग सख्ती से कानून के अनुसार ही किया जाना चाहिए
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप किया।
🔹 निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट के ये दोनों आदेश यह संकेत देते हैं कि:
✔️ जनगणना-2027 में जाति आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सरकार को गंभीरता से विचार करना होगा
✔️ चुनाव प्रक्रिया में न्यायिक हस्तक्षेप सीमित दायरे में ही संभव है
आने वाले समय में ये टिप्पणियां जनगणना नीति और चुनावी कानूनों पर दूरगामी असर डाल सकती हैं।