हाल में एक अमेरिकी प्रोफेसर मित्र ने एक चर्चा के दौरान कहा कि अमेरिकी
शासनतंत्र नीति निर्माण में 25 वर्षो की योजना बनाकर काम करता है जबकि
चीनी लोग अमूमन 50 सालों की योजना बनाते हैं। उनकी तुलना में नियोजन को
लेकर हम भारतीयों की स्थिति अत्यंत दयनीय है।
हमारी योजनाओं में कई बार न
केवल एक तदर्थता या एड हॉकिज्म का भाव दिखाई पड़ता है, बल्कि अनेक बार ये
सुविचारित भी नहीं होते। खास तौर से उच्च शिक्षा के क्षेत्र में तो यह
स्पष्ट दिखाई देता है। नवीनतम उदाहरण विश्वविद्यालयों-कॉलेजों में
असिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्ति के संबंध में मानव संसाधन विकास मंत्रलय की
हालिया घोषणा है। हालांकि इस घोषणा में कई सकारात्मक पहलू भी हैं। एक
महाशक्ति के रूप में भारत के उभरने की आकांक्षा को पूरा करने में उच्च
शिक्षा की बड़ी भूमिका होगी। इसके लिए उच्च शिक्षा और शिक्षण संस्थानों की
गुणवत्ता बढ़ाने की जरूरत है। इस गुणवत्ता को बढ़ाने में अन्य विकल्पों के
अलावा यह भी अत्यंत जरूरी है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में योग्यतम
शिक्षकों की भर्ती हो। हमारे संस्थानों में शिक्षकों की संख्यात्मकता के
साथ-साथ गुणात्मकता की भी समस्या है। संभवत: इन्हीं चीजों को ध्यान में
रखकर विश्वविद्यालयों/कॉलेजों में असिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्ति के संबंध
में ये घोषणाएं की गई हैं। इन घोषणाओं में सबसे महत्वपूर्ण तथा
स्वागतयोग्य है वैश्विक रैंकिंग में शीर्ष 500 विश्वविद्यालयों/संस्थानों
से पीएचडी डिग्री प्राप्त लोगों की सहायक प्रोफेसरों के रूप में भर्ती के
लिए विशेष प्रावधान किया जाना। इस प्रावधान का दूरगामी महत्व इस रूप में
समझा जाए कि दुनिया के शीर्ष 500 विश्वविद्यालयों में भारतीय उच्च शिक्षण
संस्थानों की संख्या मुश्किल से 8-10 ही है। इनमें इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ
साइंस बेंगलुरु, 6- 7 आइआइटी और दिल्ली विश्वविद्यालय के ही नाम शामिल हैं।
इन शीर्ष 500 संस्थानों से पीएचडी प्राप्त लोगों की नियुक्ति का विशेष
अभियान नि:संदेह हमारे शिक्षण संस्थानों की गुणवत्ता में एक मील का पत्थर
साबित होगा। अमेरिका के विभिन्न विश्वविद्यालयों में अपने अध्यापन के दौरान
मैंने पाया कि विदेशों में पढ़े अनेक भारतीय देश वापस लौटना चाहते हैं,
लेकिन भारतीय शिक्षण संस्थानों में नियुक्ति की जटिलताओं की वजह से वे लौट
नहीं पाते जबकि अमेरिका पूरी दुनिया से श्रेष्ठ शिक्षकों को आमंत्रित करने
में कोई कसर नहीं छोड़ता। 1लेकिन हालिया घोषणा के कुछ बिंदुओं पर शायद ठीक
से चिंतन-मनन नहीं किया गया है जिस पर मानव संसाधन विकास मंत्रलय और
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) को पुनर्विचार करने की जरूरत है।
वर्तमान घोषणा में कहा गया है कि विश्वविद्यालयों में असिस्टेंट प्रोफेसर
की नियुक्ति के लिए पीएचडी अनिवार्य अर्हता होगी। जबकि कॉलेजों में
नियुक्ति के लिए या तो पीएचडी अथवा स्नातकोत्तर डिग्री के साथ-साथ नेट यानी
राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा या स्लेट यानी राज्य स्तरीय पात्रता परीक्षा
में उत्तीर्ण होना अनिवार्य होगा। यहां दो तरह की समस्याएं हैं। एक तो
पीएचडी संबंधी, दूसरे नेट संबंधी। नेट यूजीसी द्वारा आयोजित एक अखिल भारतीय
परीक्षा है जिसमें पास होने का मतलब है कि उस विषय में उम्मीदवार का ज्ञान
समुचित है। जबकि पीएचडी एक तरह की विशिष्ट विशेषज्ञता है जिसमें किसी विषय
के बहुत ही छोटे से पहलू पर विशिष्ट ज्ञान हासिल होता है। पीएचडी किया हुआ
व्यक्ति अपने विषय के उस पहलू का विशेषज्ञ तो हो सकता है, लेकिन इसका कतई
अर्थ नहीं कि वह समग्र विषय का भी अच्छा और समुचित ज्ञान रखता हो। स्पष्ट
है कि विश्वविद्यालयों में नियुक्ति के लिए सिर्फ पीएचडी को आधार बनाना
उचित कदम नहीं होगा। यहां पीएचडी के साथ-साथ नेट की अनिवार्यता भी होनी ही
चाहिए। यहां सवाल उठ सकता है कि फिर विदेशी पीएचडी वालों को नेट की छूट
क्यों? तो यहां समझना जरूरी है कि विदेशों में पीएचडी में प्रवेश उन्हीं को
मिलता है जो उस विषय में मुकम्मल ज्ञान रखते हैं। 1इसके अतिरिक्त पीएचडी
से संबंधित एक अन्य समस्या भी है और वह है पीएचडी में दाखिले की प्रक्रिया।
इसके लिए आमतौर पर विभिन्न विश्वविद्यालयों में प्रवेश परीक्षा होती है।
हालांकि नेट पास लोगों को इस परीक्षा से छूट होती है। फिर नेट और प्रवेश
परीक्षा में पास लोगों का इंटरव्यू होता है। फिर जाकर अंतिम एडमिशन होता
है। दरअसल पीएचडी में दाखिले को लेकर एक बड़ी समस्या यह है कि जो
विद्यार्थी नेट पास न हो उसे विभिन्न विश्वविद्यालयों में जाकर प्रवेश
परीक्षा में बैठना पड़ता है। इसमें धन, ऊर्जा तथा समय की खासी बर्बादी होती
है। कई विश्वविद्यालयों में परीक्षा का स्तर भी निम्न होता है। यह बहुत
जरूरी है कि एआइटिपलई अथवा नीट की तर्ज पर पीएचडी में दाखिले के लिए एकल
प्रवेश परीक्षा हो। यह छूट हो सकती है कि विभिन्न विश्वविद्यालय इंटरव्यू
अपने-अपने यहां करें ताकि अपनी विशेषज्ञता के अनुसार विद्यार्थियों का
दाखिला हो सके। संयुक्त प्रवेश परीक्षा होने से पीएचडी संबंधित एक और
समस्या का भी हल हो जाएगा। वह यह कि परीक्षा का पैटर्न विभिन्न
विश्वविद्यालयों में भिन्न-भिन्न है। कहीं यह पूरी तरह से वस्तुनिष्ठ है
जैसे कि दिल्ली विश्वविद्यालय में तो कहीं यह पूर्णतया सब्जेक्टिव या
व्याख्यात्मक है जैसे कि जेएनयू में है। उचित यही होगा कि परीक्षा में
दोनों का मिलाजुला रूप हो। रिसर्च एप्टीट्यूड का प्रश्नपत्र वस्तुनिष्ठ तो
हो सकता है, लेकिन विषय संबंधित प्रश्न पत्र व्याख्यात्मक ही होना चाहिए।
इसी से उम्मीदवार के ज्ञान की गहराई और विश्लेषण क्षमता का पता चल सकेगा।
1असिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्ति के दूसरे आधार नेट पर भी आज प्रश्न चिन्ह
लग गया है। इसके वर्तमान पैटर्न में एक बड़ी कमी है कि इसका पूरी तरह
वस्तुनिष्ठ प्रश्नों वाला होना। वर्ष 2012 के पूर्व तक इस परीक्षा में एक
व्याख्यात्मक प्रश्न पत्र भी होता था, लेकिन 2012 से बिना किसी तार्किक और
उचित कारण के व्याख्यात्मक प्रश्न पत्र को खत्म कर दिया गया जो घातक सिद्ध
हो रहा है। आज नेट पास तमाम लोग मिल जाएंगे जिन्हें ठीक से एक पृष्ठ लिखना
भी नहीं आता। इनके द्वारा विद्यार्थियों का जो ‘कल्याण’ होगा उसका अंदाजा
ही लगाया जा सकता है। स्लेट को भी खत्म कर दिया जाना चाहिए। कई राज्यों ने
इसके जरिये अपने कम मेधावी छात्रों के लिए एक तरह से पिछला दरवाजा खोला है।
यह न केवल उच्च शिक्षा, बल्कि भावी पीढ़ियों के लिए भी हानिकारक है ।
1अध्यापन के द्वार योग्यतम लोगों के लिए ही खुलने चाहिए, क्योंकि यह मसला
सिर्फ नौकरी का नहीं है। इससे कई पीढ़ियों के भविष्य के साथ-साथ समाज,
राज्य व राष्ट्र की प्रगति भी जुड़ी होती है। प्रश्न है कि क्या नीति
नियामक हंिदूी अखबारों में उठाई बातों का कभी संज्ञान भी लेंगे?
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