सरप्लस अध्यापक समायोजन योजना को हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर चुनौती : Mohd Arshad

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा परिषदीय प्राथमिक विद्यालयों में RTE एक्ट के अनुसार शिक्षकों को व्यवस्थित करने हेतु चलायी जा रही सरप्लस अध्यापक समायोजन योजना को हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर चुनौती दी गयी ।
कोर्ट ने अधिवक्ता के सभी तर्कों को ख़ारिज करते हुए याचिका ख़ारिज कर दी। कोर्ट ने कहा की अधिवक्ता द्वारा काल्पनिक तथ्य प्रस्तुत किये गए। जिस विद्यालय अथवा अध्यापक को समस्या हो वो कोर्ट आये ।
कुछ दिन पूर्व मैंने पोस्ट लिख कर कहा था की सरप्लस अध्यापक अपने अपने विद्यालयों में नए नामांकन कराये लेकिन तब सभी ने यही सोचा की अब नामांकन से क्या फायदा?
अगर आप अपना ट्रांसफर रूकवाने कोर्ट गए तो कोर्ट आपकी मांग को RTE एक्ट का हवाला देते हुए आपकी याचिका ख़ारिज कर देगी।
यदि आप नामांकन कराने के बाद कोर्ट जाते हैं और कोर्ट को यह बताते हैं की नामांकन के हिसाब से आपके विद्यालय में अब सरप्लस नही है तब RTE एक्ट के तहत ही आपको अपने विद्यालय में बने रहने का आदेश कोर्ट कर सकती है। जब तक आपके विद्यालय में 30:1 का छात्र शिक्षक अनुपात नही रहेगा कोर्ट भी आपकी मदद नही कर सकेगी।
Case :- P.I.L. CIVIL No. - 14353 of 2017
Heard the petitioner in person and Sri Ajay Kumar, learned counsel for the respondent nos. 3 & 5.
Challenge raised is to the government order dated 13th June, 2017, (Annexure No. 1 to the writ petition) on the ground that its implementation is likely to cause harm in order to maintain the student teacher ratio.
It is further submitted that this can only be done after admissions are finalised in the month of August, 2017. It cannot be implemented at this stage as has been indicated for furnishing information under the government order. In effect, the challenge raised is that even if the government order is adhered to, its implementation is likely to cause impediment in its implementation and also to the institution as well as students.
These arguments are hypothetical at this stage in a public interest Writ Petition, which has been filed without there being any material or substance to substantiate the aforesaid arguments. In the absence of any such material as may be experienced by any particular institution, it will not be appropriate to test the validity of the government order. We, therefore, find no reason to entertain this writ petition, leaving it open to any aggrieved institution or person to file a writ petition in the event the government order causes any personal injury.
The writ petition is rejected with the aforesaid
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