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यूपी में शिक्षकों की भर्ती का झमेला

प्रदेश सरकार जो भी भर्तियां उच्च शिक्षा से लेकर प्राथमिक शिक्षा के लिए विज्ञापित करती हैं उनके क्रियान्वयन में सालों लग जाते हैं। कई व्यवधानों को पार करने के बाद नियुक्ति पत्र की जगह अभ्यर्थियों के घर कोर्ट का स्थगन या निरस्तीकरण आदेश पहुंचता है।
हर भर्ती के कोर्ट में पहुंचने से इतना तो स्पष्ट है कि विज्ञापन में जरूर ऐसी कोई कमी रहती है जिसके कारण याचिका उच्च न्यायालय में स्वीकार हो जाती है। एक बार मामला न्यायालय में पहुंच जाता है तो भगवान भी नहीं बता पाते कि उनको न्याय कब मिलेगा? 69000 प्राथमिक शिक्षकों की भर्ती का मामला जुलाई से ही लटका पड़ा है। कारण अधिवक्ता न्यायालय में उपस्थित नहीं हो रहे हैं। सरकार ने शिक्षामित्रों को आश्वासन दिया कि शिक्षक भर्ती में उन्हें कट आफ मार्क में छूट और वेटेज देकर धीरे-धीरे आगामी भर्तियों में समायोजित कर लिया जाएगा। जब भर्ती का नोटिफिकेशन हुआ तो उसमें कट आफ मार्क कम नहीं किया गया। बस क्या था मामला कोर्ट में चला गया। अब शिक्षा मित्र और बीटीसी वाले कोर्ट में आमने-सामने हैं। फिर से सरकार ने प्राइमरी स्कूल में बीएड वालों को भी शिक्षक भर्ती के लिए रास्ता खोल दिया है। इस प्रकार अगली भर्ती में त्रिकोणात्मक संघर्ष होना तय है। तब तक चुनाव भी आ जाएगा। सरकार कह सकती कि हमने पूरी पारदर्शिता से भर्ती शुरू की थी पर विपक्षियों के इशारे पर मामला न्यायालय में ले जाकर रुकवा दिया गया है। चुनाव बाद सरकार बनेगी तो सारी भर्ती पूरी हो जाएगी। 15 सालों से सारी भर्तियां यूपी में ऐसे ही कुचक्र में फंस रही हैं। सरकार इसके लिए चाहे जो भी तर्क दे, नौकरी तो नहीं मिली !

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