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यूपी बेसिक शिक्षा में समायोजन बना सबसे बड़ा संकट, अव्यवस्था और मानसिक उत्पीड़न से जूझते शिक्षक

 उत्तर प्रदेश की बेसिक शिक्षा व्यवस्था में यदि पूरे वर्ष को किसी एक शब्द ने सबसे अधिक प्रभावित किया है, तो वह शब्द है समायोजन। यह अब केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गई है, बल्कि हजारों शिक्षकों के लिए भय, अनिश्चितता और मानसिक तनाव का पर्याय बन चुकी है। हालात ऐसे हैं कि यह आशंका गहराने लगी है कि आने वाला वर्ष भी इसी अव्यवस्था और अस्थिरता की भेंट चढ़ सकता है।

समायोजन की प्रक्रिया ने शिक्षकों के निजी और पारिवारिक जीवन को गहरे स्तर पर प्रभावित किया है। बार-बार बदली जा रही तैनाती, अस्पष्ट आदेश और अनिश्चित भविष्य ने न केवल शिक्षकों के मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाया है, बल्कि उनके बच्चों की पढ़ाई और परिवार की स्थिरता पर भी प्रश्नचिह्न लगा दिया है। यह अब एक गंभीर मानवीय और सामाजिक मुद्दा बन चुका है।

न नियमों में एकरूपता, न प्रक्रिया में पारदर्शिता
सबसे गंभीर और आपत्तिजनक पहलू यह है कि समायोजन के लिए कोई एक समान नीति या स्पष्ट विधिक आधार नजर नहीं आता। हर जिला अपने स्तर पर नियम गढ़ रहा है और अपनी सुविधा के अनुसार उनकी व्याख्या कर रहा है। कहीं वरिष्ठता को आधार बनाया जा रहा है, तो कहीं उसे पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया है।

रिक्त पदों के आंकड़े भी कहीं स्पष्ट हैं तो कहीं केवल अनुमान और अप्रमाणित सूचनाओं पर आधारित हैं। स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि कई जगह घर बैठे पीडीएफ तैयार कर व्हाट्सएप के माध्यम से प्रसारित की जा रही हैं, मानो यह कोई आधिकारिक आदेश नहीं बल्कि अनौपचारिक फरमान हो। यह तरीका न केवल प्रशासनिक प्रक्रिया का मजाक है, बल्कि कानूनी और संवैधानिक मूल्यों के भी विपरीत है।

शिक्षक संघों की उपेक्षा, संवाद पूरी तरह ठप
इस पूरी प्रक्रिया में सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि शिक्षक संघों की मांगों और सुझावों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया है। महीनों से संघ एक समान नीति, पोर्टल आधारित समायोजन, आपत्ति दर्ज कराने का अवसर, सुनवाई की व्यवस्था और पारदर्शी सूची की मांग कर रहे हैं। इसके बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों का रवैया संवादहीन और एकतरफा बना हुआ है।

ऐसा प्रतीत होता है मानो शिक्षक संघ किसी भी तरह के हितधारक नहीं हैं। लोकतांत्रिक संवाद की जगह मौन और सहभागिता की जगह आदेशात्मक रवैया हावी हो गया है। यह दृष्टिकोण न केवल प्रशासनिक गरिमा को ठेस पहुंचाता है, बल्कि संवैधानिक प्रक्रियाओं की भी अवहेलना करता है।

शिक्षक को संख्या समझने की मानसिकता
समायोजन और स्थानांतरण जैसे संवेदनशील विषय को जिस तरह से अनौपचारिक, अपारदर्शी और गैर-जवाबदेह तरीके से लागू किया जा रहा है, उससे यह संदेश जाता है कि शिक्षक को अब एक पेशेवर नहीं बल्कि एक संख्या, एक फाइल या बोझ समझ लिया गया है।

न आपत्ति का अधिकार, न सुनवाई का मंच और न ही स्पष्ट लिखित आदेश। केवल एक संदेश दिया जा रहा है कि आदेश मानो और पालन करो। यह रवैया शिक्षकों में गहरे असंतोष, असुरक्षा और अविश्वास को जन्म दे रहा है।

शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ेगा सीधा असर
यह मान लेना बड़ी भूल होगी कि भय और अस्थिरता में जी रहा शिक्षक बेहतर शिक्षा दे सकता है। जो स्वयं मानसिक रूप से परेशान और भविष्य को लेकर असमंजस में है, वह बच्चों को स्थिरता और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कैसे दे पाएगा। समायोजन की मौजूदा प्रक्रिया शिक्षा व्यवस्था की जड़ों को कमजोर कर रही है।

आवश्यक है ठोस और पारदर्शी व्यवस्था
यदि समायोजन अपरिहार्य है, तो वह केवल लिखित, स्पष्ट और एक समान नियमों के तहत ही होना चाहिए। पूरी प्रक्रिया पोर्टल आधारित हो, आपत्ति दर्ज करने और सुनवाई की विधिवत व्यवस्था हो तथा शिक्षक संघों की सक्रिय सहभागिता सुनिश्चित की जाए। व्हाट्सएप के माध्यम से आदेश जारी करने जैसी अव्यवस्थित प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगनी चाहिए।

शिक्षा व्यवस्था कोई प्रयोगशाला नहीं है और शिक्षक कोई परीक्षण सामग्री नहीं। यदि आने वाला वर्ष भी इसी अव्यवस्था, मनमानी और संवादहीनता की भेंट चढ़ा, तो इसका खामियाजा केवल शिक्षक नहीं बल्कि पूरी पीढ़ी भुगतेगी। और तब इसकी जिम्मेदारी से कोई भी बच नहीं पाएगा।

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