रिपोर्ट के अनुसार, यदि संविदा (कॉन्ट्रैक्ट) कर्मचारी, योजना आधारित कर्मचारी, स्वायत्त संस्थानों में कार्यरत कर्मचारी तथा अन्य माध्यमों से नियुक्त मानव संसाधन पर होने वाले खर्च को भी शामिल किया जाए, तो सरकार का वास्तविक कर्मचारी व्यय आधिकारिक आंकड़ों से काफी अधिक हो सकता है।
वेतन खर्च का आकलन क्यों अधूरा माना जा रहा है?
विशेषज्ञों का कहना है कि वर्ष 2015-16 से 2020-21 के बीच केंद्र सरकार का वेतन और पेंशन पर प्रत्यक्ष खर्च जीडीपी के अनुपात में अपेक्षाकृत स्थिर रहा। वहीं राज्यों के लिए भी यह आंकड़ा कुल राजस्व प्राप्तियों का लगभग एक-चौथाई रहा है। लेकिन इन आंकड़ों में कई श्रेणियों का खर्च शामिल नहीं होता।
योजना कर्मियों की सेवाएं भी बाहर
आशा कार्यकर्ता, आंगनबाड़ी कर्मचारी, सहायकों, पोषण अभियान और विभिन्न योजनाओं में कार्यरत कर्मचारियों पर होने वाला खर्च कई बार नियमित वेतन मद में नहीं दिखता। विशेषज्ञों का मानना है कि इनके भुगतान को भी सरकारी कर्मचारी व्यय का हिस्सा माना जाना चाहिए।
स्वायत्त संस्थानों का अलग लेखा-जोखा
देशभर में अनेक विश्वविद्यालय, AIIMS, IIT, IIM, IISER, NIT सहित 350 से अधिक स्वायत्त संस्थानों को सरकार से बड़ी मात्रा में अनुदान मिलता है। इन संस्थानों के कर्मचारियों पर होने वाला खर्च अलग-अलग मदों में दर्ज होता है, जिससे सरकारी कर्मचारी व्यय का समग्र आकलन कठिन हो जाता है।
वर्गीकरण की चुनौती
विशेषज्ञों का कहना है कि विभिन्न विभागों में कर्मचारियों और सेवाओं के वर्गीकरण का तरीका अलग-अलग होने से वास्तविक वित्तीय स्थिति का सटीक मूल्यांकन करना चुनौतीपूर्ण बन जाता है।

8वें वेतन आयोग के लिए सुझाव
विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि आगामी 8वां वेतन आयोग केवल नियमित वेतन और पेंशन तक सीमित न रहे, बल्कि सरकारी सेवाओं से जुड़े सभी प्रकार के मानव संसाधनों पर होने वाले खर्च का समग्र अध्ययन करे। साथ ही भविष्य में एक ऐसा व्यापक डेटाबेस तैयार किया जाए, जिससे सरकार की वास्तविक वित्तीय स्थिति और कर्मचारी व्यय का अधिक सटीक आकलन किया जा सके।
नोट: यह रिपोर्ट विशेषज्ञों द्वारा प्रस्तुत विश्लेषण और सुझावों पर आधारित है। इसमें व्यक्त विचार सरकारी नीति या आधिकारिक निष्कर्ष नहीं हैं।
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