प्रयागराज से एक अहम शिक्षा संबंधी खबर सामने आई है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्राथमिक विद्यालयों के प्रधानाध्यापकों और सहायक अध्यापकों के मध्य सत्र में स्थानांतरण एवं समायोजन के मामले को गंभीरता से लेते हुए बेसिक शिक्षा परिषद और राज्य सरकार से जवाब तलब किया है।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट निर्देश दिया है कि जवाब दाखिल होने तक किसी भी शिक्षक के विरुद्ध कोई उत्पीड़नात्मक कार्रवाई न की जाए। यह आदेश न्यायमूर्ति मंजूरानी चौहान की एकल पीठ द्वारा दिया गया है।
⚖️ क्या है पूरा मामला?
यह याचिका अरुण प्रताप सहित 37 अन्य शिक्षकों द्वारा दाखिल की गई है। याचिकाकर्ता चित्रकूट जिले के प्राथमिक विद्यालयों में प्रधानाध्यापक और सहायक अध्यापक के पद पर कार्यरत हैं।
याचिका के अनुसार:
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शिक्षकों का मध्य सत्र में समायोजन किया जा रहा है
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उन्हें ऐसे विद्यालयों में भेजा जा रहा है जहाँ
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शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं या
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विद्यालय बंद हो चुके हैं
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सत्र की शुरुआत अप्रैल माह में होती है, ऐसे में बीच सत्र स्थानांतरण तर्कसंगत नहीं है
📜 UP RTE Act 2011 के नियमों का हवाला
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह प्रक्रिया उत्तर प्रदेश आरटीई अधिनियम 2011 के नियम 21 का स्पष्ट उल्लंघन है। नियमों के अनुसार:
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शैक्षणिक सत्र के दौरान शिक्षकों का अनावश्यक स्थानांतरण
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छात्रों की पढ़ाई और विद्यालय संचालन को प्रभावित करता है
इसी आधार पर शिक्षकों ने न्यायालय से राहत की मांग की है।
⏳ सरकार को एक सप्ताह का समय
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और बेसिक शिक्षा परिषद को:
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एक सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है
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साथ ही शिक्षकों को शीघ्र पदस्थापन (Posting) देने पर भी जोर दिया है
यह आदेश हजारों प्राथमिक शिक्षकों के लिए राहत भरा माना जा रहा है।
👨🏫 शिक्षा व्यवस्था पर असर
भारत में शिक्षक को राष्ट्र निर्माता माना जाता है। मध्य सत्र में स्थानांतरण से:
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छात्रों की पढ़ाई प्रभावित होती है
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शिक्षकों पर मानसिक दबाव बढ़ता है
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विद्यालयों की कार्यप्रणाली बाधित होती है
इसी कारण यह मामला शिक्षा जगत में चर्चा का विषय बना हुआ है।