Leaderboard Ad – Below Nav

Ad – Above Posts (Multiplex/Display)

Ad – Between Posts Section

दिल्ली के रामलीला मैदान में गूंजेगी शिक्षकों की आवाज — TET अनिवार्यता के खिलाफ UP के शिक्षकों का महाआंदोलन

उत्तर प्रदेश के मऊ जिले में 27 फरवरी 2026 को उत्तर प्रदेशीय प्राथमिक शिक्षक संघ, उत्तर प्रदेशीय जूनियर हाईस्कूल शिक्षक संघ और महिला शिक्षक संघ ने मिलकर TET अनिवार्यता के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया। लेकिन इस बार आंदोलन जिले की सीमाओं तक नहीं रुकेगा।

शिक्षकों ने एलान किया है कि आगामी मार्च में दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में एक विशाल प्रदर्शन किया जाएगा — जो पूरे देश को यह संदेश देगा कि लाखों शिक्षक इस फैसले को स्वीकार करने को तैयार नहीं।


मऊ में क्या हुआ — एक नजर में

मऊ में प्रदर्शन का सिलसिला बीएसए कार्यालय से पैदल मार्च के साथ शुरू हुआ। शिक्षक कलेक्ट्रेट पहुंचे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संबोधित ज्ञापन सिटी मजिस्ट्रेट को सौंपा।

प्रदर्शन में शामिल प्रमुख संगठन:

  • उत्तर प्रदेशीय प्राथमिक शिक्षक संघ
  • उत्तर प्रदेशीय जूनियर हाईस्कूल शिक्षक संघ
  • महिला शिक्षक संघ
  • विशिष्ट बीटीसी शिक्षक संघ

शिक्षकों की सबसे बड़ी मांग: अध्यादेश लाए सरकार

प्रदेशीय प्राथमिक शिक्षक संघ के जिलाध्यक्ष कृष्णानंद राय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि 25-30 साल की निष्ठापूर्ण सेवा के बावजूद TET की शर्त थोपना पूरी तरह गलत है। उनकी सीधी मांग है — सरकार अध्यादेश लाकर इस अनिवार्यता को तुरंत समाप्त करे।

जिलाध्यक्ष डॉ. रामविलास भारती ने एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया: "शिक्षकों के अलावा किसी भी सरकारी विभाग में इस तरह की परीक्षा अनिवार्यता नहीं है — तो फिर केवल शिक्षकों के साथ यह भेदभाव क्यों?"

यह सवाल पूरे आंदोलन की जड़ में है।


रामलीला मैदान प्रदर्शन क्यों है बड़ा कदम?

दिल्ली का रामलीला मैदान भारत के इतिहास में कई बड़े जन आंदोलनों का गवाह रहा है। यहां प्रदर्शन करने का निर्णय यह दर्शाता है कि:

1. आंदोलन अब राष्ट्रीय स्तर पर जा रहा है — सिर्फ UP नहीं, देशभर के शिक्षकों को एकजुट करने की कोशिश है।

2. सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति — जब राष्ट्रीय राजधानी में हजारों शिक्षक उतरेंगे, तो नीति-निर्माताओं को इस मुद्दे को गंभीरता से लेना होगा।

3. मीडिया और जनता का ध्यान — रामलीला मैदान से उठी आवाज पूरे देश में सुनाई देती है।


यह आंदोलन सिर्फ UP तक सीमित नहीं

बदायूं, मऊ, और UP के दर्जनों जिलों में एक साथ हो रहे प्रदर्शन यह साफ करते हैं कि यह किसी एक संगठन या जिले का मुद्दा नहीं — यह लाखों शिक्षकों की सामूहिक पीड़ा है।

जिलाप्रदर्शन का स्वरूपप्रमुख संगठन
बदायूंबीएसए से DM कार्यालय तक मार्चTFI (Teachers Federation of India)
मऊबीएसए से कलेक्ट्रेट तक मार्चप्राथमिक व जूनियर शिक्षक संघ
दिल्ली (आगामी)रामलीला मैदान महारैलीसंयुक्त शिक्षक संगठन

क्या है TET विवाद की असली जड़?

Right to Education (RTE) Act 2009 में पारित हुआ और उत्तर प्रदेश में 2011 से लागू हुआ। इसके तहत TET को नई भर्तियों के लिए अनिवार्य किया गया था।

अब सर्वोच्च न्यायालय के एक निर्देश की व्याख्या करते हुए 2011 से पहले नियुक्त शिक्षकों पर भी TET लागू करने की बात उठ रही है। शिक्षकों का तर्क सरल और तार्किक है:

जो कानून 2011 में बना, वह 2011 से पहले की नौकरियों पर कैसे लागू हो सकता है?

यह पूर्वव्यापी प्रभाव (Retrospective Effect) का मामला है, जिसे भारतीय कानूनी परंपरा में आमतौर पर उचित नहीं माना जाता।


शिक्षकों की नौकरी दांव पर — आंकड़ों में समझें

  • उत्तर प्रदेश में लाखों शिक्षक 2011 से पहले नियुक्त हुए हैं।
  • इनमें से अधिकांश की उम्र अब 45 से 55 वर्ष के बीच है।
  • TET पास न करने पर नौकरी जाने का प्रत्यक्ष खतरा।
  • परिवारों की आजीविका, बच्चों की पढ़ाई — सब कुछ दांव पर।

इस उम्र में दोबारा परीक्षा देने की मानसिक और व्यावहारिक चुनौती को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।


सरकार के पास क्या विकल्प हैं?

शिक्षक समुदाय और कानूनी जानकार तीन संभावित रास्ते सुझाते हैं:

1. अध्यादेश — सरकार एक अध्यादेश लाकर 2011 से पहले नियुक्त शिक्षकों को TET से छूट दे सकती है।

2. संसद में कानून — RTE Act में संशोधन करके यह स्पष्ट किया जाए कि TET केवल नई भर्तियों पर लागू होगी।

3. न्यायालय में पुनर्विचार याचिका — सरकार सर्वोच्च न्यायालय में इस मुद्दे पर स्पष्टीकरण मांग सकती है।


निष्कर्ष: एक जायज लड़ाई, जिसे सुना जाना चाहिए

मऊ से उठी आवाज और दिल्ली के रामलीला मैदान तक की योजना — यह सब बताता है कि यह आंदोलन न थकने वाला और न रुकने वाला है।

जो शिक्षक 25-30 साल से बच्चों का भविष्य संवारते आए हैं, उनके अनुभव और समर्पण को एक परीक्षा की कसौटी पर कसना न तो न्यायसंगत है और न व्यावहारिक।

सरकार को चाहिए कि वह इन शिक्षकों की बात सुने और एक स्थायी, न्यायपूर्ण समाधान निकाले — इससे पहले कि रामलीला मैदान में यह आवाज और बुलंद हो जाए।


यह ब्लॉग पोस्ट अमर उजाला में प्रकाशित मऊ की खबर पर आधारित है (27 फरवरी 2026)।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

UPTET news