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नैतिकता से भटकते शिक्षक और गिरता सामाजिक विश्वास

कुछ शिक्षक ऐसे भी सामने आ रहे हैं, जो शिक्षा के मंदिर में सेवा देने के बजाय अधिकारियों के कथित प्रतिनिधि बनकर रिश्वत की वसूली जैसे अनैतिक कार्यों में संलिप्त रहे हैं। यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि इस गतिविधि से उन्हें व्यक्तिगत रूप से कितना लाभ मिलता रहा होगा और इसकी कीमत समाज को कितनी चुकानी पड़ी।

शिक्षक समाज का मार्गदर्शक होता है। उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह ईमानदारी, नैतिकता और आदर्शों का पालन करे। लेकिन जब वही शिक्षक अपने पद का दुरुपयोग कर भ्रष्ट व्यवस्था का हिस्सा बन जाता है, तो न केवल शिक्षा व्यवस्था की साख प्रभावित होती है, बल्कि समाज का विश्वास भी डगमगाने लगता है।

अभी भी समय है कि ऐसे शिक्षक आत्ममंथन करें और स्वयं को सुधारने का प्रयास करें। अन्यथा देर-सबेर ऐसी परिस्थितियाँ अवश्य आएंगी, जब उन्हें न सिर्फ प्रशासनिक और कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा, बल्कि परिवार और समाज की नजरों में भी उनका सम्मान समाप्त हो जाएगा।

शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए यह आवश्यक है कि शिक्षक अपने कर्तव्यों को निष्ठा और ईमानदारी से निभाएँ। तभी आने वाली पीढ़ी को सही दिशा और स्वस्थ मूल्य दिए जा सकेंगे। 

*इन शिक्षक महोदय को कितना हिस्सा मिलता रहा होगा जो अधिकारियों के प्रतिनिधि बनकर रिश्वत की वसूली में व्यस्त रहते थे ,अभी भी समय है ,ऐसे शिक्षक अपने आपको सुधार लें अन्यथा एक न एक दिन यह स्थिति आनी तय है तब आप परिवार -समाज सबकी आंखों से गिर जाएंगे....*




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