प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाले आदेश में उत्तर प्रदेश भर में कार्यरत सहायक अध्यापकों की नियुक्तियों की व्यापक जांच कराने का निर्देश दिया है।
कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि यह जांच छह माह के भीतर पूरी की जाए और जिन शिक्षकों की नियुक्तियां फर्जी या अवैध पाई जाएं, उनकी न केवल नियुक्ति रद्द की जाए बल्कि अब तक दिए गए वेतन की वसूली भी की जाए।🔹 प्रमुख सचिव को सौंपी गई जिम्मेदारी
न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान ने अपने आदेश में कहा कि:
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प्रमुख सचिव, बेसिक शिक्षा
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प्रदेशभर में हुई सहायक अध्यापक नियुक्तियों की
👉 छह माह में जांच पूरी करें -
अवैध नियुक्तियों को रद्द करें
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फर्जी नियुक्तियों पर वेतन वसूली सुनिश्चित करें
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इस पूरे फर्जीवाड़े में शामिल अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करें
🔹 कोर्ट की तीखी टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कहा कि:
“राज्य सरकार द्वारा जारी कई सर्कुलर और निर्देशों के बावजूद शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता लाने के लिए जिम्मेदार अधिकारी अवैध नियुक्तियों के खिलाफ समय पर और प्रभावी कार्रवाई करने में विफल रहे हैं।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि अधिकारियों की निष्क्रियता:
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धोखाधड़ी को बढ़ावा देती है
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शिक्षा प्रणाली की जड़ों को कमजोर करती है
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और सबसे अधिक नुकसान छात्रों के हितों को पहुंचाती है
जिसे किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
🔹 क्या था मामला?
यह आदेश देवरिया निवासी गरिमा सिंह की याचिका पर सुनवाई के दौरान पारित किया गया।
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देवरिया के बीएसए ने
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याची के शैक्षणिक व निवास प्रमाण-पत्र जाली पाए जाने पर
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उनकी नियुक्ति रद्द कर दी थी
याची ने दावा किया कि:
❌ आदेश मनमाना है
❌ बिना सुनवाई का अवसर दिए पारित किया गया
❌ रिश्तेदार की शिकायत पर कार्रवाई हुई
🔹 कोर्ट ने याचिका क्यों खारिज की?
हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए साफ कहा कि:
“बच्चों को दी जाने वाली शिक्षा से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।”
कोर्ट ने माना कि:
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यदि दस्तावेज फर्जी हैं
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तो नियुक्ति स्वतः अवैध हो जाती है
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और ऐसे मामलों में कठोर कार्रवाई आवश्यक है
🔹 पूरे प्रदेश पर पड़ेगा असर
इस आदेश का प्रभाव:
✔️ प्रदेश के हजारों सहायक अध्यापकों पर
✔️ बेसिक शिक्षा विभाग की नियुक्ति प्रक्रिया पर
✔️ फर्जीवाड़े में लिप्त अधिकारियों पर
सीधा पड़ेगा। आने वाले छह माह में शिक्षा विभाग में बड़ा प्रशासनिक और कानूनी भूचाल आ सकता है।
🔹 निष्कर्ष
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह आदेश:
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शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखने
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फर्जी नियुक्तियों पर रोक लगाने
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और बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करने
की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है।