Leaderboard Ad – Below Nav

Ad – Above Posts (Multiplex/Display)

Ad – Between Posts Section

आरक्षण योग्यता में बाधक नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने नीट के आल इंडिया कोटे में ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण को सही ठहराया

कहा, मेरिट को सामाजिक रूप से प्रासंगिक बनाया जाना चाहिए

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को मेडिकल पाठ्यक्रम की परीक्षा नीट के आल इंडिया कोटे में ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण को सही ठहराते हुए कहा कि आरक्षण योग्यता में बाधक नहीं है, बल्कि इसका वितरण परिणाम को व्यापक बनाता है। कोर्ट ने कहा, परीक्षा में उच्च अंक योग्यता का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं। योग्यता या मेरिट सामाजिक रूप से प्रासंगिक होनी चाहिए। समानता जैसे आगे बढ़ाने वाले सामाजिक मूल्यों की पुर्नसकल्पना में औजार की तरह इसका इस्तेमाल होना चाहिए। लिहाजा, आरक्षण योग्यता के लिए बाधक नहीं है।


यह बात न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ और एएस बोपन्ना की पीठ ने नीट के आल इंडिया कोटे में ओबीसी को 27 और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) को 10 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने को हरी झंडी देने वाले गत सात जनवरी के आदेश का कारण जारी करते हुए अपने फैसले में कही है। कोर्ट ने उस दिन आरक्षण के साथ नीट काउंसलिंग की इजाजत देते हुए कहा था कि आदेश का कारण बताने वाला विस्तृत फैसला बाद में जारी किया जाएगा। कोर्ट ने कहा, आल इंडिया कोटे में आरक्षण लागू करने से पहले केंद्र को कोर्ट की इजाजत की जरूरत नहीं थी। अत: आल इंडिया कोटे में आरक्षण प्रदान करना नीतिगत निर्णय है, जो कि हर आरक्षण नीति की तरह न्यायिक समीक्षा के अधीन होगा।

अधिकार का सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, बिना वसीयत की संपत्ति में बेटी को मिलेगी अन्य सहभागियों पर प्राथमिकता

बिना वसीयत किए दिवंगत संतानहीन महिला की संपत्ति उसके मूल स्नोत को वापस होगी

अंक हमेशा योग्यता आंकने का सर्वश्रेष्ठ तरीका नहीं

’ सुप्रीम कोर्ट ने कहा, समाज के कई वर्ग सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से लाभ की स्थिति में रहे हैं। यह परीक्षा में उनकी सफलता की वजह बनता है।

’ अंक व्यक्तिगत योग्यता आंकने का हमेशा सर्वश्रेष्ठ तरीका नहीं हो सकता। फिर भी अंकों को अक्सर योग्यता का प्रतिनिधि माना जाता है।

’ >>आरक्षण देना सरकार का नीतिगत निर्णय, कोर्ट की अनुमति जरूरी नहीं

परीक्षा से पता नहीं चलता, पृष्ठभूमि का कितना लाभ मिला

’ शीर्ष अदालत ने कहा,किसी खुली प्रतिस्पर्धा वाली परीक्षा में, जो अवसर की समानता केवल औपचारिक रूप से देती हो, योग्यता को प्रदर्शन की संकुचित परिभाषा में नहीं ढाला जा सकता।

’ खुली प्रतियोगी परीक्षाएं यह परिलक्षित नहीं करती हैं कि किसी खास वर्ग को सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से कितना लाभ हुआ, जिसके योगदान के बल पर उसे परीक्षाओं में कामयाबी मिली।

योग्यता पर ये कहा : कोर्ट ने कहा कि यह समझना आवश्यक है कि ‘योग्यता’ खुद की बनाई नहीं होती। योग्यता में इर्द-गिर्द का परिवेश, परिवार का माहौल, स्कूली शिक्षा, भाग्य और प्रतिभा का उपहार शामिल होता है, जिसे समाज किसी की उन्नति में सहायक मानता है। ‘परीक्षा में प्राप्तांक’ के आधार पर योग्यता के विचार की गहरी छानबीन की जरूरत है। परीक्षा शैक्षणिक अवसरों के वितरण का एक आवश्यक और सुविधाजनक तरीका है।

प्रतिनिधित्व पर ये कहा : कोर्ट ने कहा कि समूहों को आरक्षण दिया जाता है, ताकि समानता कायम की जा सके। इससे एक विसंगति आ सकती है कि चिह्न्ति समूह, जिसे आरक्षण मिला है, उसके कुछ लोग पिछड़े न हों या जिन्हें आरक्षण नहीं मिला है, उनमें से कुछ में पिछड़े होने के चिह्न् हों। यह फर्क व्यक्तिगत तौर पर विशेष लाभकारी हालात और भाग्य के कारण हो सकता है, पर इस असमानता को हटाने में कोटे की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता।

क्यों अहम है फैसला

इस समय सुप्रीम कोर्ट में मराठा आरक्षण समेत जातिगत आरक्षण के कई मामले लंबित हैं। इसे देखते हुए नीट के आल इंडिया कोटे में ओबीसी आरक्षण पर शीर्ष अदालत का यह फैसला खास तौर पर महत्वपूर्ण है। आने वाले दिनों में यह फैसला विभिन्न मामलों में उदाहरण के तौर पर पेश किया जा सकता है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

UPTET news