"सरकार ने शिक्षामित्रों का सम्मान छीन लिया": अखिलेश के इस बयान पर हिमांशु राणा की टिप्पणी

राजनीति है तो कोई कुछ भी कहने के लिए स्वतंत्र हैं और आप तो मुख्यतः से क्यूंकि शिक्षा के क्षेत्र में आपने इन्हे शिक्षक बनाकर जो शिक्षाविभाग में क्रान्ति का उदगमन किया था
और इन सभी के बावजूद मा० सर्वोच्च न्यायालय से जो उपरोक्त उल्लेखित क्रान्ति का परिणाम आया है उस पर आपका ये बयान ********

बहरहाल विश्वास है इस बात का कि ये परिणाम आपके सत्ता में रहते हुए आया होता तो आपके द्वारा वोट बैंक की नीति को ध्यान में रखते हुए इनके लिए मा० सर्वोच्च न्यायालय से आए हुए आदेश को धता पढ़ाते हुए इनके लिए कुछ भी कर गुजरने की इच्छा रहती परन्तु शांत मन से कम से कम एक बार अवश्य आपको शोध करना चाहिए कि क्या ये निर्णय आपका सही था ?
अगर सही था तो मा० सर्वोच्च न्यायालय में जब मेरे द्वारा दस्तक दी गई थी उसके बाद आप मा० उच्च न्यायालय , इलाहाबाद में भी पैरवीकार रहे तो गलती कहाँ हुई आपसे ?
आपकी गलती बस इतनी है कि आपने वादा किया बिना सोचे और आपके द्वारा बनाई गई काठ की हांडी बार-बार क्या न्यायालय ने पहली बार ठीक से सुनने में बाद चढ़ने ही नहीं दी थी |
आज भी वही अधिकारी हैं जिनके हस्ताक्षर से आपने जबरन समायोजन कराया और आज उनके ही हस्ताक्षर से मा० न्यायालय के आदेश में लिखी बातों को अमल में लाया जा रहा है जिसकी जिम्मेदारी अभी तक किसी ने नहीं ली बल्कि आपके द्वारा पुनः ऐसी बात करके इनके जख्मों को कुरेदा जा रहा है जबकि आदेश वही बहाल हुआ है जिसकी पैरवी आपकी सत्ता में मा० उच्च न्यायालय एवं मा० सर्वोच्च न्यायालय तक हुई थी |
फिलहाल जो शिक्षानीति बनाई जाने की आहट है उससे एक बात तो साफ़ है कि आगामी चुनावों में इन पर होने वाली राजनीति समाप्त हो जाएगी बस इन्तजार है तो सही समय का इसके अलावा मा० सर्वोच्च न्यायालय भी आगामी दो भर्तियों का हवाला दिया है उसके बाद ये शिक्षामित्र नामक पद और उसके आधार पर चल रही नेतागिरी/राजनीति भी हमेशा के लिए गंगा में विसर्जित हो जानी है , बस उचित मार्गदर्शन भविष्य में दावेदारी रखने वालों को मिलना चाहिए |
हर हर महादेव 🚩🚩🚩🚩🚩
धन्यवाद
📝 Himanshu Rana

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