सुप्रीम कोर्ट आर्डर का गहनता पूर्वक अध्ययन , निम्नलिखित खामियां आई नजर

# पुनर्विचार, उपचारात्मक और संविधानिक पीठ#
जैसा आपको पता है कि याची मुद्दा लगभग खत्म हो चुका है .सुप्रीम कोर्ट ने केवल फैसला सुनाया है उसने अपने फैसले में न्याय नहीं किया है .ऐसे तमाम खामियां है ऑर्डर में जिसको लेकर ना आप संतुष्ट हो पा रहे हैं ना ही हमारे लीगल टीम ,सही बताएं तो जो जो जॉब पाया है
उसको भी संतुष्टि नहीं है, जॉब न पाने वाले पुनर्विचार याचिका, उपचारात्मक याचिका संविधानिक पीठ की बात करें तो ठीक लगता है लेकिन जॉब वाला जब इन बातों की बात करता है तो बड़ा आश्चर्य होता है.
हमारी टीम ने आर्डर का गहनता पूर्वक अध्ययन किया जिसमें निम्नलिखित खामियां नजर आई............
1- SC की 89 नंबर पाने वाली महिला जो की प्रथम काउंसलिंग करा कर बाहर है जबकि याची लाभ में 83 नंबर पाने वाला जनरल का पुरुष जॉब कर रहा है
2- जब यह सिटे रिजर्व कैटेगरी की मेरिट 83 नंबर की है तो सुप्रीम कोर्ट ने क्या सोचकर 90 कर दिया!
जिस संविधान की रक्षा करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के जज बैठे हुए हैं उसी संविधान द्वारा जब रिजर्व कैटेगरी को 83 नंबर किया गया है तो क्या सुप्रीम कोर्ट के जज संविधान से ऊपर हैं संविधानिक पीठ में पहला और सबसे बड़ा प्रश्न यही बनता है !
3- जब 15वां संशोधन सही है और उनकी जीत हुई है तो सिर्फ उनको मात्र बची हुई 6000 सीट क्यों और हारने वाले को किस आधार पर 66 हजार ?
4- जब सुप्रीम कोर्ट अंतरिम आदेश पर भर्ती प्रारंभ की तो अपने हर ऑर्डर में यह लिखवाती थी कि जब मैं अंतिम फैसला करूंगा तो उसमें दया या परिस्थितियों के आधार पर किसी को कोई राहत नहीं दी जाएगी फिर सुप्रीम कोर्ट ने परिस्थितियों के आधार पर 66,000 को किस नियम से बचा दिया ?
5- 15वां संशोधन को भूषण की बेंच ने अलग-अलग यूनिवर्सिटियों की मार्क के आधार पर विभिंता पाए जाने के कारण रद्द किया था जबकि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने 15 में संशोधन को टेट के आधार पर रद्द कर दिया है
इसकी भी समीक्षा होनी अनिवार्य है !
6- माननीय सर्वोच्च न्यायालय का यह तर्क की हमने जो 66 हजार अंतरिम आदेश के तहत परिस्थितियों वश करा दिया है अब उसमें कोई छेड़छाड़ नहीं होगी यह गले से नहीं उतरता है
मैं माननीय सर्वोच्च न्यायालय से यह पूछना चाहता हूं कि आपने ऐसी परिस्थितियां ही क्यों बनाई जिससे लाखों लोगों का करियर बर्बाद हो गया !
आपने बची हुई सीटों पर नए विज्ञापन निकालकर भर्ति करने के लिए राज्य पर छोड़ दिया है जबकि उसी राज्य ने नए विज्ञापन पर 35 से 40 हजार रुपया युवा बेरोजगारों का लिया है और अभी तक उस पर सास ढकार भी नहीं ले रही है.....
7- माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अपने अंतरिम आदेशों में हमारे टेट की वैलिडिटी , B.Ed की वैलिडिटी पर अपना रुख स्पष्ट करने को कहा था जब की अंतिम आर्डर में उन्होंने इस पर कुछ भी स्पष्ट नहीं कहा है ,सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि बिना टेट की वैधता और B.Ed की समय सीमा बढ़ाएं हम तो किसी नए विज्ञापन में आवेदन ही नहीं कर सकते हैं इसलिए माननीय सर्वोच्च न्यायालय से इस पर भी स्पष्ट रूख जाना जरूरी है।।।।
7- जब टेट केवल पात्रता परीक्षा ही है तो माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने किस आधार पर 90 अंक पर ही मेरिट को रोक दिया जबकि रिजर्व और विकलांग कैटेगरी के महिला पुरुष 90 के नीचे काउंसलिंग करा कर बैठे हैं
8- जब माननीय सर्वोच्च न्यायालय ही अपने अंतरिम आदेश में यह यह कहा था कि कि जब तक 97 के ऊपर रिजर्व कैटेगरी के अभ्यर्थी रहेंगे तो माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने यह कहा था कि की मेरिट 97 से नीचे ना गिराई जाय तो सरकार ने कोर्ट को गुमराह करके किस प्रकार से मेरिट को नीचे गिराया है संविधानिक पीठ में हम यह भी मामला रखेंगे !!!
9- हम संविधान पीठ में समानता के अधिकार के उल्लंघन का मामला भी उठाएंगे कि किस आधार पर आवेदन और काउंसलिंग कराने वाले को आपने बाहर किया है जबकि आवेदन ना करने वाले को आपने नौकरी दे दिया है !
क्या किसी केस में याची बनना संविधानिक आधार है या संविधान के नियमों के विरुद्ध भर्ती करना संविधान के किस नियम के अनुकूल है ?
10- क्या कोई भी भर्ती बिना सर्विस रूल और आरक्षण के पालन के बिना जायज ठहरायी जा सकती है ?
11- 1100 मेजितने भी RESPONDENTS थे उनको याची लाभ नहीं मिला जो कि हाईकोर्ट के सिंगल और डिवीज़न बेंच से याचि थे और अंत में वह जिस 15 वें संशोधन के लिए लड़ रहे थे उसमें जीते भी उसके बावजूद भी उनको नौकरी नहीं मिली ,,
जीतने वाले को मात्र मात्र 6000 सीटें और हारने वाले को 66,000 सीटें मिली यह पहली बार हुआ है कि जीतने वाला जॉब से बाहर है और हारने वाला जॉब के अंदर है इसकी समीक्षा होनी चाहिए?
ऐसे ही तमाम बिंदु हैं जिसको हम पुनर्विचार याचिका के माध्यम के बाद संविधानिक पीठ में ले जाएंगे और अपने हक के लिए अंतिम प्रयास करेंगे
सफलता के चांसेस बहुत कम है फिर भी कभी-कभी गुच्छे की आखिरी चाबी भी ताला खोल देती है
पुनर्विचार याचिका 99% खारिज ही होती है क्योंकि इस में जजों को थूक कर चाटना होता है और कोई भी जज थूक करचाटना नहीं चाहता है
अगर बात सिर्फ थूक कर चाटने की होती तो थूक कर चाट भी लेते हैं
लेकिन यहां पर तो जजों ने पूरा खखार कर थूक दिया है इसलिए इनसे अब बहुत ज्यादा उम्मीदें नहीं है
जो भी थोड़ी बहुत उम्मीदें बची हैं वह संविधानिक पीठ में ही बची है मेरी जानकारी में अभी तक सुप्रीम कोर्ट में फांसी के मैटर में ही उपचारात्मक और पुनर्विचार याचिका में लोग गए हैं ,,,इस तरह का मामला शायद पहली बार बन रहा है
सफलता मिले या ना मिले फिर भी इस तरीके का मामला सुप्रीम कोर्ट में इतिहास के रूप में जाना जाएगा और इतिहास रोज-रोज नहीं बनते हैं लेकिन जब बनते हैं तो इतिहास बदल देते हैं
आप सभी लोगों से गुजारिश है कि याची बनने के लिए बहुत ज्यादा व्याकुल ना हो क्योंकि संविधानिक पीठ से जो भी मामला आएगा नियमों के अनुकूल आएगा और उस नियम में जो आएंगे सबको लाभ मिलेगा
इसलिए सभी लोग यह जितने भी मुद्दे हैं एक साथ मिलकर उठाएं और जोरदार ढंग से उठाएं टुकड़ों में लड़ने से किसी को कुछ नहीं मिलेगा
इस मुद्दे पर अगर सभी लोग मिलकर लड़ेंगे और मजबूती से साथ देंगे तो लड़ा जाएगा
अगर किसी को यह लगता है कि वह वह इस मुद्दे पर मजबूती से लड़ सकता है तो मैं और मेरी टीम पूरे दिलोजान से उसकी मदद करेंगे ,,,,,
अगर इन बिंदुओं को कोई लेकर सुप्रीम कोर्ट जा रहा है तो हम उसकी भी मदद करने के लिए तैयार है आपके हिसाब भी अगर कोई बिंदु बचते हैं तो आप भी कमेंट के माध्यम से सलाह सुझाव दे सकते हैं,,,,,,,,,
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