लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक जून से धरना प्रदर्शन
कर रहे शिक्षामित्रों ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के
आश्वासन पर आज तेरहवें दिन धरना प्रदर्शन समाप्त दिया। मुख्यमंत्री ने
शिक्षामित्र संगठन के आठ सदस्यीय प्रतिनिधि मंडल से मुलाकात की और
शिक्षामित्रो के मानदेय में वृद्धि करने के साथ कोई बीच का रास्ता निकालने
की बात कहते हुए प्रदर्शन ख़त्म करने का आग्रह किया।
लम्बी हैं शिक्षामित्रों के संघर्ष कहानी
उत्तर
प्रदेश प्राथमिक शिक्षामित्र सयुंक्त मोर्चा के प्रांतीय अध्यक्ष शिवकुमार
शुक्ला ने बताया, "साल 2001 में उत्तर प्रदेश सरकार ने संविदा पर 2250
रुपए न्यूनतम मानदेय पर शिक्षामित्रों को भर्ती करना शुरू किया था। उत्तर
प्रदेश के प्राथमिक विद्यालयों में 1 लाख 70 हजार शिक्षामित्रों की
नियुक्ति सरकार द्वारा की गयी थी। साल 2009 में बसपा सरकार के दौरान प्रदेश
के शिक्षामित्रों ने समान वेतन सहित नियमित करने के लिए संघर्ष किया गया
तो तत्कालीन सरकार ने दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से बीटीसी प्रशिक्षण की
अनुमति दे दी। यह संघर्ष 2014 में सफल भी हुआ और समाजवादी सरकार में
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश के शिक्षामित्रों को पहली बार में
58,856, दूसरी बार में 72 हजार शिक्षामित्रों को बतौर सहायक अध्यापक
नियुक्ति दे दी। जिसमे 14 हजार शिक्षा मित्र समायोजित होने से रह गये थे।
इस बीच सर्वोच्च न्यायालय का आदेश आने के बाद शिक्षामित्रों के समायोजन को
रद्द कर दिया। जिस पर प्रदेश सरकार और शिक्षामित्र संगठन दोनों सर्वोच्च
न्यायालय गये।
न्यायालय के फैसले की भेंट चढ़ गये 600 से ज्यादा शिक्षामित्र
आगे
शिवकुमार शुक्ला बताते हैं, "न्यायालय ने हमारा स्टे ख़ारिज करते हुए
शिक्षामित्रों के समायोजन को रद्द कर दिया। ये फैसला आनें के बाद उत्तर
प्रदेश के लाखो शिक्षामित्रों के परिवार की खुशिया एक झटके में ख़त्म हो
गयी। बहुत से शिक्षामित्र इस आघात को सहन नही कर पाए और सदमें और आर्थिक
तंगी के चलते 25 जुलाई 2017 से अब तक प्रदेश में 600 से अधिक शिक्षामित्रों
की जान चली गयी।
दो बार हुई मुख्यमंत्री से बात ...
शिव
कुमार शुक्ला ने बताया कि न्यायालय के फैसले के बाद जिला, मंडल, प्रदेश
स्तर पर बराबर आन्दोलन चलाया गया। 1 अगस्त 2017 को मुख्यमंत्री से
शिक्षामित्रों की समस्या पर वार्ता हुई, समाधान न हो पाने पर आन्दोलन के
दौरान 23 अगस्त को फिर से मुख्यमंत्री से शिक्षामित्रों के प्रतिनिधि मंडल
की बात हुई। इस मुलाकत में मुख्यमंत्री ने एक उच्चस्तरीय टीम गठित करके
शिक्षामित्रों के समस्या के निराकरण के आदेश दिए, लेकिन उस पर भी कुछ नहीं
हो पाया, जिसके चलते दुबारा आन्दोलन करना पड़ा।
सुसाइड नोट लिख शिक्षामित्र ने की आत्महत्या
उत्तर
प्रदेश के जनपद एटा से आये शिक्षामित्र अशोक कुमार ने बताया कि जब सहायक
अध्यापक पद पर नियुक्ति हुई तो 38 से 40 हजार वेतन मिल रहा था, अचानक जब
सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद परिस्थितिया बदली तो शिक्षामित्रों के
सामने अस्तित्व का संकट पैदा हो गया।
वो आगे
बताते हैं, "हमारे एटा जिले के अलीगंज निवासी व् प्राथमिक विद्यालय ओनेरा
में तैनात मनमोहन सिंह ने एक पन्ने पर आर्थिक तंगी का हवाला देते हुए फ़ांसी
लगाकर जान दे दी। आर्थिक चपेट की तंगी में इस फैसले से प्रदेश के 1 लाख 70
हजार परिवार आज भी हैं।
'योगीजी पिता समान हैं, मुझे उम्मीद है न्याय मिलेगा'
बाराबंकी
नगर से आईं शिक्षामित्र आरती यादव ने बताया कि अब इतनी उम्र हो गयी हैं
कि कही और नौकरी मिलेगी भी नहीं। बच्चो का एडमिशन अच्छे स्कूल में करवा
दिया था। नौकरी जाने के बाद फीस न भर पाने के करण बच्चो को स्कूल से निकाल
दिया गया और दूसरे स्कूल में एडमिशन करवाना पड़ा।समाज में सब हँसते हैं,
शिक्षामित्रों पर फैसले के बाद से अब तक जिन्दगी बहुत ज्यादा तनाव में है।
योगी जी पिता के समान है और मुझे उम्मीद हैं कि वो हम लोगो के लिए
सम्मानपूर्ण विकल्प जरूर निकालेंगे।"
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