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"पेंसिल छोटी, सपने बड़े — यही हैं हमारे बेसिक के बच्चे": असली परीक्षा

असली परीक्षा

असली परीक्षा
बेसिक विद्यालयों के बच्चे ही देते हैं…

परीक्षा के नाम से
जिन्हें कोई भय नहीं होता,
क्योंकि डर से पहले
ज़िंदगी से उनका परिचय हो चुका होता है।

परीक्षा देने जो बच्चे जाते हैं,
उनकी पेंसिल की लंबाई
उनके माता-पिता को भी नहीं पता होती…
बार-बार इधर-उधर ताकते हुए
शिक्षक से कहते हैं—
“पेंसिल नई है सज्जी…”

घर लौटने पर
कोई यह नहीं पूछता
कि पेपर कैसा हुआ,
बस इतना जान लेना काफी है—
“हो गया।”

ये बच्चे बेफिक्री में जीते हैं,
इन्हें अभी
स्ट्रेस और टेंशन जैसे
शब्दों की समझ नहीं होती।

कुछ तो सुबह आकर पूछ लेते हैं—
“आज काहे का पेपर है,
सरजी/मैम जी?”
जिसका भी हो,
देने को हर समय तैयार।

तीन दिन में
छह-छह पेपर निपटा देते हैं,
बिना किसी गैप के…
और फिर परीक्षा खत्म होने की
खुशियां ऐसे मनाते हैं
जैसे कोई जंग जीत ली हो।

न आगे निकलने की होड़,
न पीछे रह जाने का ग़म…
रिज़ल्ट कार्ड अगर
33 प्रतिशत का भी हो,
तब भी चेहरे पर
180 वोल्ट वाली मुस्कान रहती है।

ये किताबों से कम,
ज़िंदगी से ज़्यादा सीखते हैं,
कठिन रास्तों पर चलकर भी
सपनों का सागर लांघते हैं।

इन्होंने कम उम्र में ही
सीख लिया है—
हर मुश्किल से लड़ना,
वो शिक्षा
जो बड़े-से-बड़े विद्यालय
भी नहीं दे पाते।

ये अपने संघर्षों को
अपना परचम बनाते हैं 🚩
और इन्हीं रास्तों से होकर
सितारा बनकर जगमगाते हैं।

सच कहें तो—
ये बेसिक के बच्चे
“कुछ नहीं” में भी
हँसना सिखा जाते हैं…




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