इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संपत्ति विवाद से जुड़े एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि उत्तराधिकार के मामलों में पंजीकृत वसीयत (Registered Will) को ही कानूनी मान्यता दी जाएगी। कोर्ट ने कहा कि अपंजीकृत वसीयत संदेह के दायरे में आती है, खासकर जब उसके पक्ष में ठोस सबूत न हों।
यह फैसला वाराणसी के नवाबगंज क्षेत्र में स्थित एक आवासीय मकान और अन्य संपत्तियों के उत्तराधिकार से जुड़े विवाद में दिया गया।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला परमानंद लाल श्रीवास्तव की संपत्तियों से जुड़ा था, जिनका निधन 22 नवंबर 2002 को हुआ था। संपत्ति को लेकर दो अलग-अलग वसीयतें सामने आई थीं:
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पहली वसीयत (1996)
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पंजीकृत (Registered Will)
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बेटी सुधा और दिवंगत दूसरी बेटी के बेटों के पक्ष में
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दूसरी वसीयत (2002)
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अपंजीकृत (Unregistered Will)
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मृतक के भतीजे राकेश व अन्य के पक्ष में
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हाईकोर्ट ने क्या कहा?
न्यायमूर्ति संदीप जैन की एकल पीठ ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि:
✔️ 1996 की पंजीकृत वसीयत पूरी तरह वैध है
❌ 2002 की अपंजीकृत वसीयत फर्जी और संदिग्ध है
कोर्ट ने साफ किया कि जब दो वसीयतें सामने हों, तो पंजीकृत वसीयत को अधिक विश्वसनीय माना जाएगा, जब तक उसके खिलाफ मजबूत और ठोस साक्ष्य न हों।
कानूनी दृष्टि से क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
यह निर्णय उन लोगों के लिए बेहद अहम है जो संपत्ति की वसीयत को लेकर भविष्य में विवाद से बचना चाहते हैं।
👉 इस फैसले से मिलने वाले प्रमुख संदेश:
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वसीयत का पंजीकरण कराना बेहद जरूरी
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अपंजीकृत वसीयत अदालत में कमजोर मानी जाती है
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परिवारिक संपत्ति विवादों में यह फैसला नजीर बनेगा
विशेषज्ञों की राय
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला भविष्य में संपत्ति विवादों में Registered Will की अहमियत को और मजबूत करेगा और फर्जी दावों पर रोक लगाएगा।