लोगों की सेहत दुरुस्त रखने के लिए स्वास्थ्य देखभाल, पोषणयुक्त भोजन और जीवन-स्तर में सुधार हो रहा है और इससे बड़ा बदलाव भी आ रहा है। बढ़ती जीवन प्रत्याशा, घटती जन्म दर और बड़ी होती बुजुर्ग आबादी के
माहौल में बुजुर्गों के लिए सन् 1999 में लागू की गई ‘सामाजिक सुरक्षा और आय (ओल्ड एज सोशल ऐंड इनकम सिक्योरिटी या ओएसिस)’ योजना जरूरी हो जाती है। भारत में 60 और उससे ज्यादा उम्र के लोगों की आबादी 2023 में लगभग 15 करोड़ थी। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की ‘इंडिया एजिंग रिपोर्ट-2023’ में अनुमान लगाया गया है कि यह आबादी 2050 तक 35 करोड़ (आबादी का 25 प्रतिशत) हो जाएगी। इसी तरह, युवा लोगों पर निर्भर रहने का अनुपात 2020 के 16 से बढ़कर 2050 तक 34 प्रतिशत हो जाएगा।बुजुर्गों को सामाजिक सुरक्षा देने के लिए सरकार की ओर से पिछले दो दशकों में कई नीतिगत कदम उठाए गए हैं। इनमें सरकारी कर्मचारियों के लिए बिना फंड वाली निश्चित-लाभ पेंशन योजनाओं को निश्चित-योगदान योजनाओं में बदला गया है और आम नागरिकों के लिए राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (एनपीएस) शुरू की गई है। हालांकि, एनपीएस के दायरे में आने वाले लोगों में वित्तीय समझ की कमी के कारण इस योजना में मामूली प्रगति हो पाई है। इसमें आर्थिक सुरक्षा की हीला-हवाली को भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता है, इसलिए इस नीति में बदलाव जरूरी हो गया है।
असल में, बुजुर्गों को सामाजिक सुरक्षा देने के लिए एक ऐसी नीति बननी चाहिए, जो उनकी सामाजिक सुरक्षा और आय, दोनों सुनिश्चित करे। इसके लिए सेवानिवृत्ति या साठ साल के बाद पेंशन योजना लागू करने के बजाय जन्म से ही इस पर ध्यान देना चाहिए। बच्चों के लिए हाल ही में शुरू की गई ‘एनपीएस-वात्सल्य योजना’ इसी तरह की एक पहल है। इस योजना में 1,000 रुपये वार्षिक योगदान देने वाले 18 साल से कम उम्र के बच्चे को शामिल किया जाता है।
एक सुझाव यह है कि देश के हरेक बच्चे को जन्म के समय ही ‘परमानेंट रिटायरमेंट अकाउंट नंबर (प्रान)’ दिया जाए और केंद्र सरकार की तरफ से 1,000 रुपये के शुरुआती योगदान के साथ प्रान-डान कार्ड (डान का मतलब डिफेंडिंग अ न्यूबोर्न या नवजात की सुरक्षा) जारी किया जाए। अगर, 2026 से इस योजना को लागू किया जाता है, तो इसमें शामिल होने वाले बच्चे 2047 में 21 साल के होंगे। तब तक उनके प्रान खाते में इतनी रकम जमा हो जाएगी कि वे आर्थिक रूप से निश्चिंत हो सकेंगे। हिसाब लगाकर देखें, तो इस योजना में 25 साल की उम्र तक सालाना 1,200 रुपये, 26-30 साल की उम्र तक 1.2 लाख रुपये, 31-40 साल की उम्र तक 1.8 लाख रुपये, 41-50 साल की उम्र तक 2.4 लाख रुपये और 51-60 साल की उम्र तक सालाना 3 लाख रुपये जमा करने होंगे। इन्हें नौ प्रतिशत वार्षिक ब्याज की दर से गणना की जाए, तो 60 साल की उम्र तक यह रकम 4.2 करोड़ रुपये से ज्यादा हो जाएगी। यह दर एनपीएस फंड पर मौजूदा रिटर्न रेट के लगभग बराबर है। इससे हर महीने 2.1 लाख रुपये से ज्यादा (छह प्रतिशत दर) की पेंशन मिल सकती है और मूलधन भी सुरक्षित रहेगा। दूसरी ओर, बिना कोष वाली पेंशन पा रही ज्यादातर बुजुर्ग आबादी 2047 तक गुजर चुकी होगी। तब, भारत बड़े पैमाने पर ओएसिस योजना को लागू करने की स्थिति में आ जाएगा।
दानदाताओं को ज्यादा प्रोत्साहित करने के लिए सरकार को हरेक बच्चे पर सालाना 1,000 रुपये निवेश की जरूरत है। पूरी रकम को 60 साल तक लॉक करने से भारत को लंबे समय तक चलने वाली परियोजनाओं में भी मदद मिलेगी। दशकों में जमा हुआ पेंशन फंड का यह बड़ा पूल (एनपीएस में 150 अरब रुपये से ज्यादा) आर्थिक विकास में मदद करेगा। अलग-अलग देशों के अनुभव बताते हैं कि जहां बड़ी आबादी को पेंशन दी जा रही है, वहां बुजुर्गों में गरीबी दर बहुत कम है।
कहा भी गया है कि आप खाई को पार करने के लिए दो बार छलांग नहीं लगा सकते। इसलिए देश की पेंशन की खाई को पार करने के लिए एक ही लंबी नीतिगत छलांग लगाने का समय आ गया है।
(साथ में प्रवीण तिवारी)
