NPS (National Pension System) को लागू हुए लगभग 20 वर्ष होने जा रहे हैं, लेकिन आज भी बड़ी संख्या में कर्मचारियों के NPS खाते या तो खुले नहीं हैं या फिर वे शिफ्टिंग, कटौती और तकनीकी समस्याओं में उलझे हुए हैं।
डर और भ्रम की शुरुआत
एक समय ऐसा भी था जब कई कर्मचारी NPS खाता खुलवाना चाहते थे, लेकिन उन्हें यह कहकर डराया गया कि—
-
सरकार NPS का पैसा मार्केट में लगाती है
-
अगर देश में आपातकाल आया तो पैसा डूब सकता है
इन आशंकाओं के कारण कई कर्मचारियों ने NPS से दूरी बनाए रखी।
कोरोना काल की याद और भविष्य की आशंका
2019–20 में कोरोना महामारी के दौरान जब महंगाई भत्ता (DA) फ्रीज कर दिया गया, तब कर्मचारियों के मन में यह डर और गहरा हो गया कि—
-
संकट की स्थिति में सरकार OPS या NPS दोनों में राहत नहीं देगी
कर्मचारियों का मानना है कि
जब देश की आर्थिक स्थिति मजबूत होती है, तभी OPS/NPS भी मजबूत रहता है।
NPS बनाम Non-NPS: वेतन को लेकर बड़ा भ्रम
अक्सर यह कहा जाता है कि—
NPS होल्डर को Non-NPS कर्मचारी से हर माह 14% अधिक सैलरी मिलती है।
👉 वास्तविक स्थिति क्या है?
-
NPS में सरकार Basic + DA का 14% योगदान कर्मचारी के NPS खाते में जमा करती है
-
यह राशि इन-हैंड सैलरी नहीं, बल्कि रिटायरमेंट फंड का हिस्सा होती है
उदाहरण के तौर पर:
-
यदि किसी Non-NPS कर्मचारी की सैलरी ₹70,000 है
-
तो NPS कर्मचारी की इन-हैंड सैलरी अधिक नहीं होती,
बल्कि सरकार का 14% योगदान अलग से उसके NPS खाते में जाता है
इस कारण यह कहना कि NPS होल्डर को हर महीने ₹7,800 “अधिक सैलरी” मिलती है, तकनीकी रूप से सही नहीं, बल्कि यह भविष्य की पेंशन बचत है।
निष्कर्ष
✔ NPS को लेकर वर्षों से भ्रम और अविश्वास बना हुआ है
✔ तकनीकी समस्याओं ने कर्मचारियों की परेशानी बढ़ाई
✔ NPS का 14% योगदान तुरंत मिलने वाली सैलरी नहीं, बल्कि रिटायरमेंट सुरक्षा है
✔ OPS बनाम NPS की बहस में स्पष्ट और ईमानदार जानकारी सबसे जरूरी है