उत्तर प्रदेश में परिषदीय विद्यालयों के सरप्लस शिक्षकों के समायोजन को लेकर शिक्षा विभाग एक बार फिर विवादों में घिर गया है। हाल ही में जारी की गई समायोजन सूची के बाद प्रदेश के कई जिलों में शिक्षक संगठनों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है। इस सूची को लेकर शिक्षकों में भारी नाराजगी देखी जा रही है।
शिक्षक संगठनों का कहना है कि सरप्लस शिक्षक समायोजन प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी की गई है। विद्यालयों में छात्र संख्या, शिक्षक अनुपात और विषयवार आवश्यकता जैसे महत्वपूर्ण मानकों को नजरअंदाज कर समायोजन किया गया है। इससे कई विद्यालयों में शिक्षकों की कमी और कहीं अधिकता की स्थिति बन गई है।
आरोप है कि समायोजन सूची में वरिष्ठता, पात्रता और सेवा अवधि का सही आकलन नहीं किया गया। कई अनुभवी शिक्षकों को दूरस्थ क्षेत्रों में भेज दिया गया, जबकि कुछ शिक्षक वर्षों से सुविधाजनक स्थानों पर बने हुए हैं। इससे शिक्षा व्यवस्था में असंतुलन और असंतोष बढ़ा है।
प्रदेश के विभिन्न जिलों में शिक्षक संघों ने जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी कार्यालयों पर प्रदर्शन कर ज्ञापन सौंपे हैं। शिक्षकों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि समायोजन सूची में शीघ्र सुधार नहीं किया गया, तो यह विरोध राज्यव्यापी आंदोलन का रूप ले सकता है।
बेसिक शिक्षा विभाग का कहना है कि सरप्लस शिक्षक समायोजन प्रक्रिया सरकार की निर्धारित शिक्षक स्थानांतरण नीति के अंतर्गत की गई है। विभागीय अधिकारियों के अनुसार एकल विद्यालयों, छात्र संख्या कम या अधिक वाले स्कूलों और शहरी-ग्रामीण संतुलन को ध्यान में रखते हुए समायोजन किया गया है। हालांकि शिक्षकों का दावा है कि जमीनी स्तर पर स्थिति इससे अलग है।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि बार-बार होने वाले शिक्षक समायोजन विवादों का सीधा असर सरकारी स्कूलों की पढ़ाई पर पड़ता है। यदि शिक्षक स्थानांतरण और समायोजन में पारदर्शिता और तकनीकी आधारित डेटा का उपयोग नहीं किया गया, तो प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था कमजोर होती चली जाएगी।
सरप्लस शिक्षकों के समायोजन को लेकर उपजा यह विवाद अब केवल प्रशासनिक मामला नहीं रह गया है। यह मुद्दा उत्तर प्रदेश की शिक्षा नीति, शिक्षक प्रबंधन और सरकारी स्कूल सुधार से सीधे जुड़ गया है। आने वाले दिनों में इस पर राज्य सरकार की अगली कार्रवाई शिक्षा व्यवस्था की दिशा तय करेगी।