रामपुर : सरकार भले ही जूनियर व प्राथमिक स्कूलों में शिक्षा के सुधार
पर करोड़ों रुपये खर्च करती हो, लेकिन स्कूलों में शिक्षा व्यवस्था का बुरा
हाल है। जिले में 1150 शिक्षकों के पद खाली हैं। इससे शिक्षा व्यवस्था
प्रभावित हो रही है। छात्र बिना पढ़े ही घर वापस हो जाते हैं। ऐसे में
बच्चों का भविष्य बर्बाद हो रहा है।
सर्वशिक्षा अभियान के तहत सरकार शिक्षा को सुधारने के तमाम प्रयास कर
रही है, लेकिन जिले में जूनियर व प्राथमिक विद्यालयों में अध्यापकों की कमी
के चलते शिक्षा व्यवस्था में सुधार नहीं हो पा रहा है। जिले में लक्ष्य के
सापेक्ष 1150 शिक्षकों की कमी है। 100 से अधिक प्राथमिक व जूनियर विद्यालय
एकल अध्यापकों के भरोसे चल रहे हैं। जबकि, 251 स्कूल ऐसे हैं जो सिर्फ
शिक्षमित्रों के सहारे चल रहे हैं। यानी कुल मिलाकर शिक्षा व्यवस्था के लिए
सरकार की सारी योजनाओं पर पानी फिरता नजर आ रहा है। जिले में प्राथमिक
विद्यालयों की संख्या 1326 और जूनियर विद्यालयों की संख्या 632 है। इनमे
पढ़ाने के लिए कुल 3500 शिक्षकों की तैनाती की गई है। इसके अलावा जिले में
कुल शिक्षामित्रों की संख्या 2000 है। ग्रामीण क्षेत्र के अधिकांश
विद्यालयों पर एक-एक अध्यापकों व प्रधानाध्यापकों के भरोसे 100-100 छात्र
हैं। ऐसे में प्रधानाध्यापक व अध्यापक अकेले छात्रों को पढ़ाकर कितनी
शिक्षा की गुणवत्ता को बरकरार रख सकते हैं। इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा
सकता है। उत्तर प्रदेशीय प्राथमिक शिक्षक संघ के जिलाध्यक्ष कैलाश बाबू
कहते हैं कि स्कूलों में जो रिक्त जगह हैं उन्हें पदोन्नति से भरा जाना है।
एक-एक शिक्षक को कई-कई विद्यालयों में प्रधानाध्यापक का कार्य देखना पड़
रहा है। इसकी वजह से शैक्षिक गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। बेसिक
शिक्षाधिकारी सर्वदानंद कहते हैं कि शिक्षकों की कमी से स्कूलों में शिक्षा
व्यवस्था प्रभावित होती है।
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