रेखागणित में प्रेमिका को प्रपोजल भेजा... इस कविता में ——
तुम केन्द्र प्यार की,मैं परिधि हूँ प्रिये,
मिलन की कोई त्रिज्या बता दीजिए ।
तेरे चारों तरफ मैं फिरूँ दरबदर,
प्रेम का चाप दिल पर लगा दीजिये ॥
वक्र रेखा सी चलती हो जब तुम कभी,
लगता है जैसे कोई नदी बह चली,
लम्बवत सी कही जब हो जाओ खड़ी
तुझपे मरमिटता है हर गाँव हर गली,
मैं सरल रेख जैसा सरल हूँ प्रिये,
जब जहाँ दिल चाहे आजमा लीजिए ।
तुम केन्द्र प्यार की,मैं परिधि हूँ प्रिये,
मिलन की कोई त्रिज्या बता दीजिए ।
मेरी नजरों के दो किरण तुझपर पड़े,
तो विरह के विकर्णों से काटो ना तुम,
मैं चतुर्भुज से कटकर त्रिभुज रह गया,
अब और ज्यादा वर्गों में बाँटों ना तुम,
तेरा मुखड़ा सूत्र, जुल्फ़ है समीकरण,
मैं सवाले जिगर तुम सुलझा दीजिए ।
तुम केन्द्र प्यार की,मैं परिधि हूँ प्रिये,
मिलन की कोई त्रिज्या बता दीजिए ।
तुम हो निर्मेय,मैं प्रमेय हूँ सनम,
मेरे बिन तू अधूरी तेरे बिन हैं हम,
जिस कोण परभी मुझको बुलाओगी तुम,
एक-एक अंश दौड़े चले आये हम,
हल कुछ मैं करूँ सिद्ध तुम कुछ करो,
प्रेम की ये गणित तुम पढ़ा दीजिए,
तुम केन्द्र प्यार की,मैं परिधि हूँ प्रिये,
मिलन की कोई त्रिज्या बता दीजिए ।
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