लखनऊ। 72825 सहायक शिक्षक भर्ती से जुड़ा मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। वर्ष 2017 से शुरू हुई कानूनी लड़ाई अब तक जारी है और बड़ी संख्या में अभ्यर्थी आज भी न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
यह मामला अब केवल एक भर्ती प्रक्रिया तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि न्याय, समान अवसर और प्रशासनिक पारदर्शिता से जुड़ा गंभीर मुद्दा बन चुका है।🔹 2017 से 2025 तक चला कानूनी संघर्ष
अभ्यर्थियों के अनुसार, 25 जुलाई 2017 से लेकर 19 दिसंबर 2025 तक माननीय उच्च न्यायालय द्वारा समय-समय पर कई महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश पारित किए गए। अभ्यर्थियों का दावा है कि उन्होंने हर आदेश का विधिवत पालन (Compliance) किया, इसके बावजूद उन्हें आज तक पूर्ण नियुक्ति का लाभ नहीं मिल सका।
⚖️ समान परिस्थितियों में असमान निर्णय का आरोप
अभ्यर्थियों का आरोप है कि:
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समान अंक और समान परिस्थितियों वाले कुछ अभ्यर्थियों को नियुक्ति दे दी गई
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जबकि अन्य अभ्यर्थी अब भी चयन सूची से बाहर हैं
विशेष रूप से 7 दिसंबर 2015 को आयोजित सहायक शिक्षक भर्ती परीक्षा में 90 और 83 अंक प्राप्त करने वाले अभ्यर्थियों के मामलों को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। अभ्यर्थियों का कहना है कि जब समान स्थिति में कुछ को लाभ मिला, तो शेष को क्यों वंचित रखा गया।
😞 वर्षों की लड़ाई में बढ़ा मानसिक और आर्थिक संकट
इस लंबे संघर्ष के दौरान अभ्यर्थियों को:
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सामाजिक दबाव
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मानसिक तनाव
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आर्थिक कठिनाइयों
का सामना करना पड़ा। वर्षों तक वकीलों की फीस, बार-बार कोर्ट की पेशी और अनिश्चित भविष्य ने अभ्यर्थियों की स्थिति को और गंभीर बना दिया। इसके बावजूद अभ्यर्थियों ने कानून और न्याय व्यवस्था पर भरोसा बनाए रखा।
❓ कोर्ट आदेशों के अनुपालन पर सवाल
अभ्यर्थियों का यह भी कहना है कि:
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सभी अंतरिम आदेशों का पूर्ण अनुपालन नहीं हुआ
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चयन प्रक्रिया में स्पष्टता और पारदर्शिता का अभाव दिखाई देता है
यही कारण है कि भर्ती प्रक्रिया की निष्पक्षता पर बार-बार प्रश्नचिह्न लग रहे हैं।
📢 अभ्यर्थियों की मांग: समानता के सिद्धांत के तहत न्याय
अभ्यर्थियों की स्पष्ट मांग है कि:
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सरकार और संबंधित विभाग इस मामले को गंभीरता से लें
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संविधान के समानता के सिद्धांत के तहत सभी पात्र अभ्यर्थियों को न्याय मिले
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वर्षों से संघर्ष कर रहे अभ्यर्थियों को जल्द राहत प्रदान की जाए
🔍 केवल भर्ती नहीं, न्याय का मामला
अंततः 72825 सहायक शिक्षक भर्ती अब सिर्फ नियुक्ति का विषय नहीं रह गया है। यह मामला:
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न्यायिक आदेशों के सम्मान
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प्रशासनिक जवाबदेही
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और समान अवसर के अधिकार
से सीधे जुड़ चुका है। अब सभी की निगाहें आने वाले निर्णय पर टिकी हैं, जो हजारों अभ्यर्थियों के भविष्य की दिशा तय करेगा।