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35 साल की सेवा, रिटायरमेंट के बाद नियुक्ति अवैध करार

 नगर निगम के एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी ने करीब 35 साल सेवा की। सेवाकाल में उसे सेवा संबंधी सभी लाभ मिले। वह रिटायर हो गए। पेंशन निर्धारण के समय उनकी नियुक्ति अवैध करार दे दी गई। ऑडिट विभाग ने 2002 के शासनादेश के आधार पर कर्मचारी की नियुक्ति को अनियमित माना है।



रामचंद्र पुत्र गोपी की नियुक्ति दो सितंबर 1985 को निगम में सफाईकर्मी के पद पर हुई। उसके पिता गोपी पुत्र काशी की स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के बाद उसकी नियुक्ति हुई। वह कर्मशाला विभाग में सफाईकर्मी था। 31 जुलाई 2020 तक उसने सेवा की और रिटायर हो गया। उसके पेंशन निर्धारण की फाइल अधिष्ठान विभाग से ऑडिट विभाग भेजी गई लेकिन, विभाग ने 2002 के शासनादेश के आधार पर उसकी नियुक्ति अनियमित बताते हुए फाइल अधिष्ठान को वापस भेज दी। कहा गया कि शासनादेश में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के आधार पर हुई नियुक्ति अनियमित मानी गई है। हालांकि, सेवा के दौरान कर्मचारी को 28 मई 2013 और 15 दिसंबर 2015 को एसीपी, 25 जुलाई 2018 को प्रोन्नति वेतनमान का लाभ दिया गया। उसके चौथे, पांचवें, छठवें और सातवें वेतन का निर्धारण भी हुआ। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि सेवाकाल में उसकी नियुक्ति पर आपत्ति क्यों नहीं हुई? दावा किया जा रहा है कि तत्कालीन मुख्य लेखा परीक्षकों द्वारा फाइलें आगे बढ़ाने पर ही उसे सेवा संबंधी सभी लाभ मिले। ऑडिट विभाग की आपत्ति पर फिलहाल उसके पेंशन का निर्धारण नहीं हो सका। मुख्य नगर लेखा परीक्षक अजय कुमार का कहना है कि निगम प्रशासन को ऐक्शन लेना चाहिए था लेकिन, नहीं लिया। 2002 के शासनादेश के अनुसार नियुक्ति पर आपत्ति की गई है।

2002 के शासनादेश केआधार पर नियुक्ति अनियमित, ऑडिट विभाग की आपत्ति के कारण पेंशन का भी नहीं हो सका निर्धारण

ऑडिट विभाग ने क्या आपत्ति लगाई है?, फाइल अभी देखी नहीं है। उसे संज्ञान में लेकर शासन के फैसले के मुताबिक निर्णय लिए जाएगा। रवि रंजन, नगर आयुक्त।

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